(दूसरी इकाई) २. दो लघुकथाए (पूरक पठन)

कंगाल

इस वर्ष बड़ी भीषण गरमी पड़ रही थी । दिन तो अंगारे से तपे रहते ही थे, रातों में भी लू और उमस से चैन नहीं मिलता था । सोचा इस लिजलिजे और घुटनभरे मौसम से राहत पाने के लिए कुछ दिन पहाड़ों पर बिता आएँ । अगले सप्ताह ही पर्वतीय स्‍थल की यात्रा पर निकल पड़े । दो-तीन दिनों में ही मन में सुकून-सा महसूस होने लगा था ।

वहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य, हरे-भरे पहाड़ गर्व से सीना ताने खड़े, दीर्घता सिद्ध करते वृक्ष, पहाड़ों की नीरवता मंे हल्‍का-सा शोर कर अपना अस्‍तित्‍व सिद्ध करते झरने, मन बदलाव के लिए पर्याप्त थे ।

उस दिन शाम के वक्‍त झील किनारे टहल रहे थे। एक भुट्‌टेवाला आया और बोला-‘‘साब, भुट्‌टा लेंगे। गरम-गरम भूनकर मसाला लगाकर दूॅंगा । सहज ही पूछ लिया-‘‘कितने का है ?’’

‘‘पाँच रुपये का ।’’

‘‘क्‍या ? पाँच रुपये में एक भुट्‌टा । हमारे शहर मंे तो दो रुपये में एक मिलता है, तुम तीन ले लो ।’’

‘‘नहीं साब, ‘‘पाँच से कम में तो नहीं मिलेगा …’’

‘‘तो रहने दो…’’ हम आगे बढ़ गए ।

एकाएक पैर ठिठक गए और मन में विचार उठा कि हमारे जैसे लोग पहाड़ों पर घूमने का शौक रखते हैं हजारों रुपये खर्च करते हैं, अच्छेहोटलों में रुकते हैं जो बड़ी दूकानों में बिना दाम पूछे खर्च करते हैं पर गरीब से दो रुपये के लिए झिक-झिक करते हैं, कितने कंगाल हैं हम ! उल्‍टे कदम लौटा और बीस रुपये में चार भुट्‌टे खरीदकर चल पड़ा अपनी राह । मन अब सुकून अनुभव कर रहा था ।

सही उत्‍तर

अब तक वह कितने ही स्‍थानों पर नौकरी के लिए आवेदन कर चुका था। साक्षात्‍कार दे चुका था । उसके प्रमाणपत्रों की फाइल भी उसे सफलता दिलाने में नाकामयाब रही थी । हर जगह भ्रष्‍टाचार, रिश्वत का बोलबाला हाेने के कारण, योग्‍यता के बावजूद उसका चयन नहीं हो पाता था । हर ओर से अब वह निराश हो चुका था । भ्रष्‍ट सामाजिक व्यवस्‍था को कोसने के अलावा उसके वश में और कुछ तो था नहीं ।

आज फिर उसे साक्षात्‍कार के लिए जाना है । अब तक देशप्रेम, नैतिकता, शिष्‍टाचार, ईमानदारी पर अपने तर्कपूर्णविचार बड़े विश्वास से रखता आया था लेकिन इसके बावजूद उसके हिस्‍से में सिर्फ असफलता ही आई थी ।

साक्षात्‍कार के लिए उपस्‍थित प्रतिनिधि मंडल में से एक अधिकारी ने पूछा-‘‘भ्रष्‍टाचार के बारे में आपकी क्‍या राय है ?’’

‘‘भ्रष्‍टाचार एक ऐसा कीड़ा है जो देश को घुन की तरह खा रहा है । इसने सारी सामाजिक व्यवस्‍था को चिंताजनक स्‍थिति में पहुँचा दिया है । सच कहा जाए तो यह देश के लिए कलंक है… ।’’ अधिकारियों के चेहरे पर हलकी-सी मुसकान और उत्‍सुकता छा गई। उसके तर्क में उन्हें रुचि महसूस होने लगी । दूसरे अधिकारी ने प्रश्न किया-‘‘रिश्वत को आप क्‍या मानते हैं ?’’

‘‘यह भ्रष्‍टाचार की बहन है जैसे विशेष अवसरों पर हम अपने प्रियजनों, परिचितों, मित्रों को उपहार देते हैं । इसका स्‍वरूप भी कुछ-कुछ वैसा ही है लेकिन उपहार देकर हम केवल खुशियों या कर्तव्यों का आदान-प्रदान करते हैं । इससे अधिक कुछ नहीं जबकि रिश्वत देने से रुके हुए कार्य, दबी हुई फाइलें, टलती हुई पदोन्नति, रोकी गई नौकरी अादि में इसके कारण सफलता हासिल की जा सकती है । तब भी यह समाज के माथे पर कलंक है, इसका समर्थन कतई नहीं किया जा सकता, ऐसी मेरी धारणा है ।’’ कहकर वह तेजी से बाहर निकल आया । जानता था कि यहॉं भी चयन नहीं होगा ।

पर भीतर बैठे अधिकारियों ने… गंभीरता से विचार-विमर्श करने के बाद युवक के सही उत्‍तर की दाद देते हुए उसका चयन कर लिया। आज वह समझा कि ‘सत्‍य कुछ समय के लिए निराश हो सकता है, परास्‍त नहीं ।’

(‘मेरी चुनिंदा लघुकथाएँ’ से)