१०. रात का चौकीदार

दिसंबर-जनवरी की हाड़ कँपाती ठंड हो, झमाझम बरसती वर्षा या उमस भरी गरमी की रातें । हर मौसम में रात बारह बजे के बाद चौकीदार नाम का यह निरीह प्राणी सड़क पर लाठी ठोकते, सीटी बजाते; हमें सचेत करते हुए कॉलोनी में रात भर चक्कर लगाते रोज सुनाई पड़ता है ।

 हर महीने की तरह पहली तारीख को हल्के से गेट बजाकर खड़ा हो जाता है, ‘साब जी, पैसे?’
‘‘कितने पैसे ?’’ वह उससे पूछता है ।
‘साब जी, एक रुपया रोज के हिसाब से महीने के तीस रुपए । आपको तो मालूम ही है ।’
‘अच्छा एक बात बताओ बहादुर, महीने में तुम्हें कितने घरों से पैसे मिल जाते हैं ?’ ‘साब जी यह पक्का नहीं है, कभी साठ घर से कभी पचास से । तीज-त्योहार पर बाकी घरों से भी कभी कुछ मिल जाता है । इतने में ठीक-ठाक गुजारा हो जाता है हमारा ।’

 ‘पर कॉलोनी में तो सौ-सवा सौ से भी अधिक घर हैं, फिर इतने कम क्यों …?
तो फिर तुम उनके घर के सामने सीटी बजाकर चौकसी रखते हो कि नहीं ?’ उसने पूछा ।
‘हॉं साब जी, चौकसी रखना तो मेरी जिम्‍मेदारी है । मैं केवल पैसे के लिए ही काम नहीं करता । फिर उनकी चौकसी रखना तो और जरूरी हो जाता है । भगवान नहीं करे, यदि उनके घर चोरी-वोरी की घटना हो जाए तो पुलिस तो फिर भी हमसे पूछेगी न । और वे भी हम पर झूठा आरोप लगा सकते हैं कि पैसे नहीं देते इसलिए चौकीदार ने ही चोरी करवा दी । ऐसा पहले मेरे साथ हो चुका है साब जी ।’

 ‘अच्छा ये बताओ, रात में अकेले घूमते तुम्हें डर नहीं लगता?’
‘डर क्यों नहीं लगता साब जी, दुनिया में जितने जिंदा जीव हैं, सबको किसी न किसी से डर लगता है । बड़े आदमी को डर लगता है तो फिर हम तो बहुत छोटे आदमी हैं । कई बार नशे-पत्तेवाले और गुंडे-बदमाशों से मारपीट भी हो जाती है । शरीफ दिखने वाले लोगों से झिड़कियॉं, दुत्कार और धौंस मिलना तो रोज की बात है ।’

 ‘अच्छा बहादुर, सोते कब हो तुम ?’ वह फिर प्रश्न करता है ।

‘साब जी, रोज सुबह आठ-नौ बजे एक बार कॉलोनी में चक्कर लगाकर तसल्ली कर लेता हूँकि सबकुछ ठीक है न, फिर कल की नींद पूरी करने और आज रात में फिर जागने के लिए आराम से अपनी नींद पूरी करता हूॅं । अच्छा साब जी, अब आप पैसे दे दें तो मैं अगले घर जाऊँ ।’

 ‘अरे भाई, अभी तुमने ही कहा कि जो पैसे नहीं देते उनका ध्यान तुम्हें ज्यादा रखना पड़ता है । तो अब से मेरे घर की चौकसी भी तुम्हें बिना पैसों के करनी होगी, समझे ?’

 ‘जैसी अापकी इच्छा साब जी’, और चौकीदार अगले घर की ओर बढ़ गया ।

 मैं सोचता हूँकि बिना किसी ऊपरी दबाव अथवा नियंत्रण के एकाकी रूप से इतनी जिम्मेदारी से अपना कर्तव्य निभाने वाला, हमारी सुरक्षा की चिंता करने वाला निष्‍कपट भाव से काम करने वाला, यह रात का रखवाला स्वयं कितना असुरक्षित और अकेला है ।

 मैं रात भर ऊहापोह में रहा। ठीक से नींद भी नहीं आई । सबेरे उठने तक मैं निर्णय ले चुका था। मैंने चौकीदार को बुलाया। उससे कहा, मेरे घर की चौकसी करने का तुम्हें पूरा मेहनताना मिलेगा। चौकीदार ने सलाम किया और चला गया। मैंने चैन की साँस ली और उसके प्रति श्रद्धा बढ़ गई।