२. उसी से ठंडा, उसी से गरम

एक लकड़हारा था । जंगल में जाकर रोज लकड़ियाँ काटता और शहर में जाकर शाम को बेच देता था । एक दिन इस ख्याल से कि आस-पास से तो सब लकड़हारे लकड़ी काट ले जाते हैं । सूखी लकड़ी आसानी से मिलती नहीं इसलिए वह दूर जंगल के अंदर चला गया । सरदी का मौसम था । कड़ाके का जाड़ा पड़ रह था । हाथ-पाँव ठिठुरे जाते थे । उसकी उँगलियाँ बिलकुल सुन्न हुई जाती थीं । वह थोड़ी-थोड़ी देर बाद कुल्‍हाड़ी रख देता और दोनों हाथ मुँह के पास ले जाकर खूब जोर से उसमंे फूँक मारता कि गरम हो जाएँ ।

जंगल में न मालूम किस-किस तरह के जीव रहते हैं । सुना है, उनमें छोटे-छोटे बालिश्त भर के आदमी भी होते हैं । उनके दाढ़ी, मुँह आदि सब कुछ होते हैं मगर होते हैं बस खूँटी ही-से । हम-तुम जैसा कोई आदमी उनकी बस्‍ती में चला जाए तो उसे बड़ी हैरत से देखते हैं कि यह करता क्‍या है । लेकिन वे हम लोगों से जरा अच्छे होते हैं क्‍योंकि उनके लड़के किसी परदेशी को सताते नहीं, न तालियाँ बजाते हैं और न पत्‍थर फेंकते हैं। खुद हमारे यहाँ भी अच्छे बच्चे ऐसा नहीं करते लेकिन उनके यहाँ तो सभी अच्छे होते हैं ।

 खैर, लकड़हारा जंगल में लकड़ियाँ बीन रहा था तो एक मियाँ बालिश्तिये भी कहीं बैठे उसे देख रहे थे । मियाँ बालिश्तिये ने जो देखा कि यह बार-बार हाथ में कुछ फूँकता है तो सोचने लगे कि यह क्‍या बात है । जब कुछ समझ में न आया तो वे अपनी जगह से उठे और कुछ दूर चलकर फिर लौट आए । मालूम नहीं पूछने से यह आदमी कहीं बुरा न माने । मगर फिर न रहा गया । आखिर ठुमक-ठुमककर लकड़हारे के पास गए और कहा, ‘‘सलाम भाई, बुरा न मानो, तो एक बात पूछूँ ?’’

 लकड़हारे को जरा-से अँगूठे बराबर आदमी को देखकर ताज्‍जुब भी हुआ, हँसी भी आई । मगर उसने हँसी रोककर कहा, ‘‘हाँ-हाँ, भई जरूर पूछो।’’ ‘‘बस, यह पूछता हूँकि तुम मुँह से हाथ में फूँक-सी क्‍यों मारते हो ?’’ लकड़हारे ने जवाब दिया, ‘‘सरदी बहुत है । हाथ ठिठुरे जाते हैं। मैं मुँह से फूँककर उन्हें जरा गरमा लेता हूँ । फिर ठिठुरने लगते हैं, फिर फूँक लेता हूँ ।’’

मियाँ बालिश्तिये ने अपना सुपारी जैसा सिर हिलाया और कहा, ‘‘अच्छा, यह बात है ।’’ यह कहकर वहाँ से खिसक गए, मगर रहे आस-पास ही और कहीं से बैठे बराबर देखते रहे कि लकड़हारा और क्‍या-क्‍या करता है।

दोपहर का वक्‍त आया । लकड़हारे को खाना पकाने की फिक्र हुई। उसके पास छोटी-सी हाँड़ी थी । आग सुलगाकर उसे चूल्‍हे पर रखा और उसमें आलू उबालने के लिए रख दिए । गीली लकड़ी थी इसलिए आग बार-बार ठंडी हो जाती तो लकड़हारा मुँह से फूँककर तेज कर देता था । बालिश्तिये ने दूर से देखकर अपने जी में कहा-अब यह फिर फूँकता है । क्‍या इसके मुँह से आग निकलती है ? मगर चुपचाप बैठा देखता गया । लकड़हारे को भूख ज्‍यादा लगी थी इसलिए चढ़ी हुई हाँड़ी मंे से एक आलू, जो अभी पूरे तौर पर पका भी न था, निकाल लिया। उसे खाना चाहा तो वह ऐसा गरम था जैसे आग । उसने मुश्किल से उसे अपनी एक उँगली और अँगूठे से दबाकर तोड़ा और मुँह से‘फूँ-फूँ’ करके फूँकने लगा ।

 बालिश्तिये ने फिर मन में कहा-यह फिर फूँकता है । अब क्‍या इस आलू को फूँककर जलाएगा । लेकिन आलू जला-वला कुछ नहीं । थोड़ी देर ‘फूँ-फूँ’ करके लकड़हारे ने उसे अपने मुँह में रख लिया और गप-गप खाने लगा । अब तो इस बालिश्तिये की हैरानी का हाल न पूछो । वह ठुमक-ठुमककर फिर लकड़हारे के पास आया और बोला, ‘‘सलाम भाई, बुरा न मानो तो एक बात पूछूँ ?’’ लकड़हारे ने कहा, ‘‘बुरा क्‍यों मानूँगा, पूछो ।’’

 बालिश्तिये ने कहा, ‘‘अब इस आलू को क्‍यों फूँकते थे? यह तो खुद बहुत गरम था । इसे और गरमाने से क्‍या फायदा ?’’ ‘‘नहीं मियाँ । यह आलू बहुत गरम है । मैं इसे मुँह से फूँककर ठंडा कर रहा हूँ ।’’ यह सुनकर मियाँ बालिश्तिये का मुँह पीला पड़ गया । वे डर के मारे थर-थर काँपने लगे । बराबर पीछे हटते जाते थे । जरा-सा आदमी यों ही देखकर हँसी आए लेकिन इस थर-थर, कँप-कँप की हालत में देखकर तो हर किसी को हँसी भी आए, रंज भी हो । उसने आखिर पूछा, ‘‘क्‍यों मियाँ, क्‍या हुआ ? क्‍या जाड़ा बहुत लग रहा है ?’’ मगर मियाँ बालिश्तिये जब काफी दूर हो गए तो बोले, ‘‘यह न जाने क्‍या बला है ? शायद कोई जादूगर है । उसी से ठंडा, उसी से गरम । हमारी समझ में यह बात नहीं आती ।’’ सच तो ये है यही बात उन मियाँ बालिश्तिये की नन्हीं-सी खोपड़ी में आने की थी भी नहीं ।