२. जंगल

रीडर अणिमा जोशी के मोबाइल पर फोन था मांडवी दीदी की बहू तविषा का । कह रही थी, ‘‘आंटी, बहुत जरूरी काम है । अम्‍मा से बात करवा दें ।’’ अणिमा दीदी ने असमर्थता जताई-मांडवी दीदी कक्षा ले रही हैं । बाहर आते ही वह संदेश उन्हें दे दंेगी । वैसे हुआ क्‍या है ?

घर में सब कुशल-मंगल तो है ? परेशानी का कारण बताने की बजाय तविषा ने उनसे पुनः आग्रह किया, ‘‘आंटी, अम्‍मा से बात हो जाए तो …’’अणिमा जोशी को स्‍वयं उसे टालना बुरा लगा । ‘‘उचित नहीं लगेगा, तविषा । अनुशासन भंग होगा । मुझे बताओ, तविषा ! मुझे बताने में झिझक कैसी !’’

 ‘‘नहीं आंटी, ऐसी बात नहीं है ।’’ तविषा का स्‍वर भर्रा-सा आया । तविषा ने बताया, ‘‘घर में जो जुड़वाँ खरगोश के बच्चेपाल रखे हैं उन्होंने, सोनू-मोनू, उनमें से सोनू नहीं रहा ।’’

साढ़े दस के करीब कामवाली कमला घर में झाड़ू-पोंछा करने आई तो बैठक बुहारते हुए उसकी नजर सोनू पर पड़ी । जगाने के लिए उसने सोनू को हिलाया, उसके जगाने की सोनू पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई । वह बुदबुदाई-‘कैसे घोड़े बेचकर सो रहा है शैतान !’ उसकी टाँग पकड़कर उसे सोफे के नीचे से बाहर घसीट लिया । मगर सोनू की कोई हरकत नहीं हुई । कमला ने चीखकर तविषा को पुकारा, ‘‘छोटी बीजीऽऽऽ ।’’ तविषा अचेत सोनू को देख घबड़ा गई । गोदी में उठाया तो उसकी रेशम-सी देह हाथों में टूटी कोंपल-सी झूल गई। उसकी समझ में नहीं आ रहा था, वह क्‍या करे? आसपास जानवरों का कोई डॉक्‍टर है नहीं । अपनी समझ से उसने बच्चों के डॉक्‍टर को घर बुलाकर सोनू को दिखाया । डॉक्‍टर ने देखते ही कह दिया, ‘‘प्राण नहीं है अब सोनू में । ‘‘आंटी, आप अम्‍मा को जल्‍दी से जल्‍दी घर भेज दें । घंटे-भर में प्लेस्‍कूल से पीयूष घर आ जाएगा ।’’

 मांडवी दी घर पहुँची । सोफों के बीच के खाली पड़े फर्शपर सोनू निश्चेष्‍ट पड़ा हुआ था । पीयूष उसी के निकट गुमसुम बैठा हुआ था । मोनू, सोनू की परिक्रमा-सा करता कभी दाएँ ठिठक उसे गौर से ताकने लगता,

कभी बाएँ से । पीयूष की स्‍तब्‍धता तोड़ना उन्हें जरूरी लगा । नन्ही-सी जिंदगी में वह मौत से पहली बार मिल रहा है । मौत उसकी समझ में नहीं आ रही है । ऐसा कभी हुआ नहीं कि उन्होंने घर की घंटी बजाई हो और तीनों लपककर दरवाजा खोलने न दौड़े हों । खोल तो पीयूष ही पाता था, मगर मुँह दरवाजे की ओर उठाए वे दोनों भी पीयूष के नन्हे हाथों में अपने अगले पंजे लगा देते । पीयूष का सिर उन्होंने अपनी छाती से लगा लिया । पीयूष रोने लगा है-‘‘दादी, दादी ! ये सोनू को क्‍या हो गया ? दादी, सोनू बीमार है तो डॉक्‍टर को बुलाकर दिखाओ न… दादी ! अम्‍मी अच्छी नहीं हैं न ! बोलती हैं- सोनू मर गया…’’

वह रूँधे स्‍वर को साधती हुई उसे समझाने लगती हैं, ‘‘रोते नहीं, पीयूष । सोनू को दुख होगा । सोनू तुम्‍हंे हमेशा हँसते देखना चाहता था न !’’ माेनू उनकी गोदी में मुँह सटाए उनके चेहरे को देख रहा है, बिटर-बिटर दृष्‍टि, आँसुओं से भरी हुई । जानवर भी रोते हैं ! पहली बार उन्होंने किसी जानवर को रोते हुए देखा है । मोनू को हथेली में हल्‍के हाथों से दबोचकर उन्होंने उसे सीने से सटा लिया । हिचकियाँ भर रहा था मोनू ? काली बदली उनके चेहरों पर उतर आई है ।

अणिमा जोशी के मोबाइल से उन्होंने बेटे शैलेश को दफ्तर में खबर कर देना उचित समझा था । न जाने परेशान तविषा ने शैलेश को फोन किया हो, न किया हो। शैलेश ने कहा था, ‘‘ऐसा करें, अम्‍मा, घर पहुँच ही रही हैं । आप नीचे सोसाइटी में चौकीदार को कहकर सोनू को उठाकर अपार्टमेंट्स से लगे नाले में फिंकवा दें ।’’

 उन्होंने शैलेश से स्‍पष्‍ट कह दिया था-छुट्टी लेकर वह फौरन घर पहुँचे। उनके घर पहुँचने तक पीयूष घर पहुँच चुका होगा । नाले में वह सोनू को हरगिज नहीं फिंकवा सकतीं । पीयूष सोनू को बहुत प्यार करता है । स्‍थिति से भागने की बजाय उसका सामना करना ही बेहतर है । सोनू को घर में न पाकर उसके अबोध मन के जिन सवालों से पूरे घर को टकराना होगा-उसे संभालना कठिन होगा । जमादार को घर पहुँचते ही वे खबर कर देंगी । उनकी इच्छा है, घर के बच्चे की तरह सोनू का अंतिम संस्‍कार किया जाए । ‘‘पहुँचता हूँ ।’’ शैलेश ने कहा था ।

 उन्होंने पीयूष को समझा दिया था- ‘‘तुम्‍हारे सोनू को जमीन में गाड़ने ले जा रहे हैं, तुम्‍हारे पापा । नन्हे बच्चों की मौत होती है तो उन्हें जमीन में गाड़ दिया जाता है ।’’

‘‘दादी, उसके दिल में दुख क्‍यों था ?’’

 ‘‘उसे अपने माँ-बाप से अलग जो कर दिया गया ।’’

 ‘‘किसने किया, दादी ?’’

‘‘उस दुकानदार ने, जिससे हम उसे खरीदकर लाए थे । दुकानदार पशु-पक्षियों को बेचता है न ! तुम्‍हीं बताओ, माँ-बाप से दूर होकर बच्चे दुखी होते हैं कि नहीं ?’’

 ‘‘होते हैं, दादी । मम्‍मी, चार दिन के लिए मुझे छोड़कर नानू के पास मुंबई गई थीं तो मुझे भी बहुत दुख हुआ था ।’’

‘‘दादी, दादी ! दुख से मर जाते हैं ?’’

 ‘‘कभी-कभी पीयूष ।’’

‘‘सोनू भी मर सकता है ?’’

 ‘‘मर सकता है ।’’

 … कैसे हठ पकड़ लिया था पीयूष ने । घर में वह भी खरगोश पालेगा, तोते का पिंजरा लाएगा । तविषा और शैलेश के संग महरौली शैलेश के मित्र के बच्चे के जन्मदिन पर गया था पीयूष । उन लोगों ने मँझोले नीम के पेड़ की डाल पर तोते का पिंजरा लटका रखा था । जालीदार बड़े से बांकड़े में उन्होंने खरगोश पाल रखे थे । पीयूष को खरगोश और तोता चाहिए । तविषा और शैलेश ने बहुत समझाया-फ्लैट में पशु-पक्षी पालना कठिन है । कहाँ रखेंगे उन्हें ?’’

 ‘‘बालकनी में ।’’ पीयूष ने जगह ढूँढ़ ली । तविषा ने उसकी बात काट उसे बहलाना चाहा ‘‘पूरे दिन खरगोश बांकड़े में नहीं बंद रह सकते । उन्हें कुछ समय के लिए खुला छोड़ना होगा । छोटे-से घर में वे भागा-दौड़ी करेंगे । सुसु-छिछि करेंगे । उनकी टट्टी-पेशाब कौन साफ करेगा ?’’

 ‘‘दादी करेंगी ।’’

 ‘‘दादी पढ़ाने कॉलेज जाएँगी तो उनके पीछे कौन करेगा ?’’

 ‘‘स्‍कूल से घर आकर मैं कर लूंॅगा ।’’ सारा घर हँस पड़ा ।

 सब लोग तब और चकित रह गए, जब पीयूष ने दादी को पटाने की कोशिश की कि दादी उसके जन्मदिन पर कोई-न-कोई उपहार देती ही हैं । क्‍यों न इस बार वे उसे खरगोश और तोता लाकर दे दें । निरुत्‍तर दादी उसे लेकर लाजपत नगर चिड़ियों की दुकान पर गईं । पीयूष ने खरगोश का जोड़ा पसंद किया । तत्‍काल उनका नामकरण भी कर दिया-सोनू-मोनू ! सोनू-मोनू के साथ उनका घर भी खरीदा गया-जालीदार बड़ा-सा बांकड़ा । उस साँझ सोसाइटी के उसके सारे हमजोली बड़ी देर तक बालकनी में डटे खरगोश को देखते-सराहते रहे और पीयूष के भाग्‍य से ईर्ष्या करते रहे ।

दूसरे रोज भी मोनू सामान्य नहीं हो पाया । पीयू को भी दादी ने प्ले स्‍कूल भेजना मुनासिब न समझा । पीयू उसका घर का नाम था । पीयूष घर मंे रहेगा तो दोनों एक-दूसरे को देख ढाढ़स महसूस करेंगे । उन्होंने स्‍वयं भी कॉलेज जाना स्‍थगित कर दिया । सुबह मोनू ने दूध के कटोरे को छुआ तक नहीं । बगल में रखे सोनू के खाली दूध के कटोरे को रह-रहकर सूंॅघता रहा । उन्हें मोनू की चिंता होने लगी ।

 तविषा अपराध-बोध से भरी हुई थी । मांडवी दी से उसने अपना संशय बाँटा । चावल की टंकी में घुन हो रहे थे । उस सुबह उसने मारने के लिए डाबर की पारे की गोलियों की शीशी खोली थी चावलों में डालने के लिए । शीशी का ढक्‍कन मरोड़कर जैसे ही उसने ढक्‍कन खोलना चाहा, कुछ गोलियाँ छिटककर दूर जा गिरीं । गोलियाँ बटोर उसने टंकी में डाल दी थीं । फिर भी उसे शक है कि एकाध गोली आेने-कोने में छूट गई होगी और…

‘‘दादी … मोनू मेरे साथ खेलता क्‍यों नहीं ?’’

 ‘‘बेटा, सोनू जो उससे बिछड़ गया है । वह दुखी है । दोनों को एक-दूसरे के साथ रहने की आदत पड़ गई थी न ।’’ ‘‘मुझे भी तो सोनू के जाने का दुख है … दादी, क्‍या हम दोनों भी मर जाएँगे ?’’ मांडवी दी ने तड़पकर पीयू के मुँह पर हाथ रख दिया । डाँटा – ‘‘ऐसे बुरे बोल क्‍यों बोल रहा है ?’’ पीयू ने प्रतिवाद किया, ‘‘आपने ही तो कहा था, दादी, सोनू दुख से मर गया । ’’ ‘‘कहा था । उसे अपने माँ-बाप से बिछड़ने का दुख था । जंगल उसका घर है । जंगल मंे उसके माँ-बाप हैं । तुम तो अपने माँ-बाप के पास हो ।’’

 ‘‘दादी, हम मोनू को उसके माँ-बाप से अलग रखेंगे तो वह भी मर जाएगा दुख से ?’’

 मांडवी दी निरुत्तर……… हो अाईं ।

‘‘दादी, हम मोनू को जंगल में ले जाकर छोड़ दें तो वह अपने मम्‍मी-पापा के पास पहुँच जाएगा । फिर तो वह मरेगा नहीं न ?’’ ‘‘नहीं मरेगा … पर तू मोनू के बिना रह लेगा न ?’’ मांडवी दी का कंठ भर अाया ।

 ‘‘रह लूँगा ।’’

 ‘‘ठीक है । शैलेश से कहूँगी कि वह रात को गाड़ी निकाले और हमें जंगल ले चले । रात में ही खरगोश दिखाई पड़ते हैं । शायद मोनू के माँ-बाप भी हमें दिखाई पड़ जाएँगे ?’’

 ‘‘दादी, मैंने आपसे कहा था न, मुझे तोता भी चाहिए ?’’ ‘‘कहा था ।’’ ‘‘अब मुझे तोता नहीं चाहिए, दादी ।’’ मांडवी दी ने पीयूष को सीने से भींच लिया और दनादन उसका मुँह चूमने लगीं ।