२. लक्ष्मी

उस दिन लड़के ने तैश में आकर लक्ष्मी की पीठ पर चार डंडे बरसा दिए थे । वह बड़ी भयभीत और घबराई थी। जो भी उसके पास जाता, सिर हिला उसे मारने की कोशिश करती या फिर उछलती-कूदती, गले की रस्‍सी तोड़कर खूँटे से आजाद होने का प्रयास करती।

करामत अली इधर दो-चार दिनों से अस्‍वस्‍थ था। लेकिन जब उसने यह सुना कि रहमान ने गाय की पीठ पर डंडे बरसाए हैं तो उससे रहा नहीं गया । वह किसी प्रकार चारपाई से उठकर धीरे-धीरे चलकर बथान में आया। आगे बढ़कर उसके माथे पर हाथ फेरा, पुचकारा और हौले-से उसकी पीठ पर हाथ फेरा। लक्ष्मी के शरीर में एक सिहरन-सी दौड़ गई ।

‘‘ओह ! कंबख्त ने कितनी बेदर्दी से पीटा है ।’’

उसकी बीबी रमजानी बोली-‘‘लो, चोट की जगह पर यह रोगन लगा दो । बेचारी को आराम मिलेगा।’’

करामत अली गुस्‍से में बोला-‘‘क्‍या अच्छा हो अगर इसी लाठी से तुम्‍हारे रहमान के दोनों हाथ तोड़ दिए जाएँ । कहीं इस तरह पीटा जाता है ?’’

रमजानी बाेली-‘‘लक्ष्मी ने आज भी दूध नहीं दिया ।’’

‘‘तो उसकी सजा इसे लाठियों से दी गई ?’’ ‘‘रहमान से गलती हो गई, इसे वह भी कबूलता है ।’’ रमजानी कुछ क्षण खड़ी रही फिर वहाँ से हटती हुई बोली-‘‘देखो, अपना ख्याल रखो । पाँव इधर-उधर गया तो कमर सिंकवाते रहोगे ।’’

करामत अली ने फिर प्यार से लक्ष्मी की पीठ सहलाई । मुँह-ही-मुँह में बड़बड़ाया-‘‘माफ कर लक्ष्मी, रहमान बड़ा मूर्खहै । उम्र के साथ तू भी बुढ़ा गई है । डेयरीफार्म के डॉक्‍टर ने तो पिछली बार ही कहदिया था, यह तेरा आखिरी बरस है।’’

लक्ष्मी शांत खड़ी अपने जख्मों पर तेल लगवाती रही । वह करामत अली के मित्र ज्ञान सिंह की निशानी थी । ज्ञान सिंह और करामत अली एक-दूसरे के पड़ोसी तो थे ही, वे कारखाने में भी एक ही विभाग में काम करते थे । प्रायः एक साथ ड्यूटी पर जाते और एक साथ ही घर लौटते।

ज्ञान सिंह को मवेशी पालने का बहुत शौक था । प्रायः उसके घर के दरवाजे पर भैंस या गाय बँधी रहती। तीन बरस पहले उसने एक जर्सी गाय खरीदी थी । उसका नाम उसने लक्ष्मी रखा था । अधेड़ उम्र की लक्ष्मी इतना दूध दे देती थी कि उससे घर की जरूरत पूरी हो जाने के बाद बाकी दूध गली के कुछ घरों में चला जाता। दूध बेचना ज्ञान सिंह का धंधा नहीं था। केवल गाय को चारा और दर्रा आदि देने के लिए कुछ पैसे जुटा लेता था ।

नौकरी से अवकाश के बाद ज्ञान सिंह को कंपनी का वह मकान खाली करना था । समस्‍या थी तो लक्ष्मी की । वह लक्ष्मी को किसी भी हालत में बेच नहीं सकता था । उसे अपने साथ ले जाना भी संभव नहीं था । जब अवकाश में दस-पंद्रह दिन ही रह गए तो करामत अली से कहा-‘‘मियाँ ! अगर लक्ष्मी को तुम्‍हें सौंप दूंॅ तो क्‍या तुम उसे स्‍वीकार करोगे…?’’

मियाँ करामत अली ने कहा था-‘‘नेकी और पूछ-पूछ । भला इससे बड़ी खुशनसीबी मेरे लिए और क्‍या हो सकती है ?’’ करामत अली पिछले एक वर्ष से उस गाय की सेवा करता चला आ रहा था । गाय की देखभाल में कोई कसर नहीं छोड़ रखी थी। करामत अली को लक्ष्मी की पीठ पर रोगन लगाने के बाद भी इत्मीनान नहीं हुआ । वह उसके सिर पर हाथ फेरता रहा ।

लक्ष्मी स्‍थिर खड़ी उसकी ओर जिज्ञासापूर्ण दृष्‍टि से देखती रही । करामत अली को लगा जैसे लक्ष्मी कहना चाहती हो- ‘‘यदि मैं तुम्‍हारे काम की नहीं हूँ तो मुझे आजाद कर दो। मैं यह घर छोड़कर कहीं चली जाऊँगी ।’

करामत अली ड्यूटी पर जाने की तैयारी में था । तभी रमजानी बोली- ‘‘रहमान के अब्‍बा, अगर लक्ष्मी दूध नहीं देगी तो हम इसका क्‍या करेंगे ? क्‍या खूँटे से बाँधकर हम इसे खिलाते-पिलाते रहेंगे…?’’

‘‘जानवर है । बँधा है तो इसे खिलाना-पिलाना तो पड़ेगा ही।’’ ‘

‘जानते हो, इस महँगाई के जमाने में सिर्फ सादा चारा देने में ही तीन-साढ़े तीन सौ महीने का खर्चाहै ।’’

‘‘सो तो है ।’’ कहते हुए करामत अली आगे कुछ नहीं बोला । घर से निकलकर कारखाने की तरफ हो लिया । रास्ते में वह रमजानी की बात पर विचार कर रहा था, लक्ष्मी अगर दूध नहीं देगी तो इसका क्‍या करेंगे। यह ख्याल तो उसके मन में आया ही नहीं था कि एक समय ऐसा भी आ सकता है कि गाय को घर के सामने खूँटे सें बाँधकर मुफ्त में खिलाना भी पड़ सकता है ।

उसके साथी नईम ने उसे कुछ परेशान देखा तो पूछा-‘‘करामत मियाँ, क्‍या बात है, बड़े परेशान नजर आते हो ? खैरियत तो है?’’

‘‘ऐसी कोई विशेष बात नहीं है ।’’

‘‘कुछ तो होगा ।’’

‘‘ क्‍या बताऊँ । गाय ने दूध देना बंद कर दिया है, बूढ़ी हो गई है। बैठाकर खिलाना पड़ेगा और इस जमाने में गाय-भैंस पालने का खर्चा…।’’

‘‘इसमें परेशान होने की क्‍या जरूरत है ? गाय बेच दो ।’’

करामत अली ने हौका भरते हुए कहा, ‘‘हाँ, परेशानी से छुटकारा पाया जा सकता है । बहुत आसान तरीका है । लक्ष्मी को बेच दिया जाए।’’ वह नईम के पास से हटकर अपने काम में जुट गया ।

करामत अली रात का गया सवेरे कारखाने से घर लौटा । रात की ड्यूटी से घर लौटने पर ही वह लक्ष्मी को दुहता था । घर में घुसते ही उसने रमजानी से पूछा-‘‘क्‍या लक्ष्मी को अभी तक चारा नहीं दिया ?’’

रमजानी बोली-‘‘रहमान से कहा तो था ।’’

‘‘तुम दाेनों की मर्जी होती तो गाय काे अब तक चारा मिल चुका होता। अगर वह दूध नहीं दे रही है तो क्‍या उसे भूखा रखोगे ?’’ कहते हुए करामत कटा हुआ पुआल, खली और दर्रा आदि ले जाकर लक्ष्मी के लिए सानी तैयार करने लगा।

लक्ष्मी उतावली-सी तैयार हो रही सानी में मुँह मारने लगी । गाय को सानी देकर करामत अली उसकी पीठ देखने लगा । रोगन ने अच्छा काम किया था । दाग कुछ हल्‍के पड़ गए थे ।

दस-पंद्रह दिनों से यों ही चल रहा था । एक दिन जब करामत अली ने पुआल लाने के लिए रमजानी से पैसे माँगे तो वह बोली, ‘‘मैं कहाँ से पैसे दूँ ? पहले तो दूध की बिक्री के पैसे मेरे पास जमा रहते थे ।

उनमें से दे देती थी । अब कहाँ से दूँ ?’’

‘‘लो, यह राशन के लिए कुछ रुपये रखे थे ।’’

कहते हुए रमजानी ने संदूकची में से बीस का एक नोट निकालकर उसे थमाते हुए कहा,‘‘इससे लक्ष्मी का राशन ले आओ ।’’

‘‘ठीक है । इससे लक्ष्मी के दो-चार दिन निकल जाएँगे ।’’

‘‘आखिर इस तरह कब तक चलेगा ?’’

रमजानी दुखी स्‍वर में बोली। ‘‘तुम इसे खुला छोड़कर,आजमाकर तो देखो ।’’

‘‘कहते हो तो ऐसा करके देख लेंगे ।’’

दूसरे दिन रहमान सवेरे आठ-नौ बजे के करीब लक्ष्मी को इलाके से बाहर जहाँ नाला बहता है, जहाँ झाड़-झंखाड़ और कहीं दूब के कारण जमीन हरी नजर आती है, छोड़ आया ताकि वह घास इत्‍यादि खाकर अपना कुछ पेट भर ले । लेकिन माँ-बेटे को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि लक्ष्मी एक-डेढ़ घंटे बाद ही घर के सामने खड़ी थी । उसके गले में रस्‍सी थी । एक व्यक्‍ति उसी रस्‍सी को हाथ में थामे कह रहा था-‘‘यह गाय क्‍या आप लोगों की है ?’’

“रमजानी ने कहा, ‘‘हाँ ।’’

‘‘यह हमारी गाय का सब चारा खा गई है । इसे आप लोग बाँधकर रखें नहीं तो काँजी हाउस में पहुँचा देंगे ।’’ रमजानी चुप खड़ी आगंतुक की बातें सुनती रही ।

दोपहर बाद जब करामत अली ड्यूटी से लौटा और नहा-धाेकर कुछ नाश्ते के लिए बैठा तो रमजानी उससे बोली-‘‘मेरी मानो तो इसे बेच दो ।’’ ‘‘फिर बेचने की बात करती हो…?

कौन खरीदेगा इस बुढ़िया को।’’

‘‘रहमान कुछ कह तो रहा था, उसे कुछ लोग खरीद लेंगे । उसने किसी से कहा भी है । शाम को वह तुमसे मिलने भी आएगा ।’’

करामत अली सुनकर खामोश रह गया । उसे लग रहा था, सब कुछ उसकी इच्छा के विरुद्ध जा रहा है, शायद जिसपर उसका कोई वश नहीं था। करामत अली यह अनुभव करते हुए कि लक्ष्मी की चिंता अब किसी को नहीं है, खामोश रहा । उठा और घर में जो सूखा चारा पड़ा था, उसके सामने डाल दिया ।

लक्ष्मी ने चारे को सूँघा और फिर उसकी तरफ निराशापूर्ण आँखों से  देखने लगी । जैसे कहना चाहती हो, मालिक यह क्या ? आज क्‍या मेरे फाँकने को यह सूखा चारा ही है । दर्रा-खली कुछ नहीं ।

करामत अली उसके पास से उठकर मँुह-हाथ धोने के लिए गली के नुक्‍कड़ पर नल की ओर चला गया । सात-आठ बजे के करीब रहमान एक व्यक्‍ति को अपने साथ लाया। करामत अली उसे पहचानता था । इसके पहले कि उससे कुछ औपचारिक बातें हों, करामत अली ने पूछा, ‘‘क्‍या तुम गाय खरीदने आए हो ?’’

उसने जवाब में कहा-‘‘हाँ’’

उसने जवाब में कहा-‘‘हाँ’’

‘‘तो क्‍या हुआ …?’’
‘‘तुम इसे लेकर क्‍या करोगे …?’’
‘‘मैं कहीं और बेच दूंॅगा ।’’
‘‘यह तुम्‍हारा पुराना धंधा है । मैं जानता हूँ । मुझे तुम्‍हें गाय नहीं बेचनी।’’

करामत मियाँ ने उसे कोरा जवाब दे दिया । रमजानी करामत के चेहरे के भाव भाँपती हुई बोली-‘‘क्‍या यह भी कोई तरीका है, आने वाले को खड़े-खड़े दुत्‍कारकर भगा दो ।’’
‘‘तुम जानती हो वह कौन है…?’’ करामत अली ने कटु स्‍वर में कहा।
‘‘वह लक्ष्मी को ले जाकर वहाँ बेच आएगा जहाँ यह टुकड़े-टुकड़े होकर बिक जाएगी । मेरे दोस्‍त ज्ञान सिंह को इसका पता चल गया तो वह मेरे बारे में क्‍या सोचेगा ।’’
उस दिन करामत अली बिना कुछ खाए-पिए रात को बिना बिस्‍तर की चारपाई पर पड़ा रहा । नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी।

रात काफी निकल चुकी थी । सवेरे देर तक वह लेटा ही रह गया। कुछ देर बाद करामत अली ने चारपाई छोड़ी । मुँह-हाथ धो, घर से बाहर निकल पड़ा । लक्ष्मी के गले से बँधी हुई रस्‍सी खूँटे से खोली और उसे गली से बाहर ले जाने लगा । रमजानी, जो दरवाजे पर खड़ी यह सब देख रही थी, बोली- ‘‘इसे कहाँ ले चले ?’

करामत अली ने कहा-‘‘जहाँ इसकी किस्‍मत में लिखा है ।’’

वह लक्ष्मी को सड़क पर ले आया । लक्ष्मी बिना किसी रुकावट या हुज्‍जत के उसके पीछे-पीछे चली जा रही थी । वह उसकी रस्‍सी पकड़ेसड़क पर आगे की ओर चलता चला गया । चलते-चलते कुछ क्षण रुककर वह बोला-‘‘लक्ष्मी चल, अरे ! गऊशाला यहाँ से दो किलोमीटर दूर है । तुझे गऊशाला में भरती करा दूंॅगा ।

वहाँ इत्‍मीनान से रहना । वहाँ तू हमारे घर की तुलना में मजे से रहेगी । भले ही मैं वहाँ न रहूँ पर जो लोग भी होंगे, मेरे ख्याल में तुम्‍हारे लिए अच्छेही होंगे। मैं कभी-कभी तुम्‍हें देख आया करूँगा। तब तू मुझे पहचानेगी भी या नहीं, खुदा जाने, ’’ कहते हुए करामत अली का गला भर आया। उसकी आँखों में आँसू उतर आए ।

‘‘चल, लक्ष्मी चल । जल्‍दी-जल्‍दी पैर बढ़ा’’ और वह खुद किसी थके-मांॅदे बूढ़े बैल की तरह भारी कदमों से आगे बढ़ने लगा ।