३. गाना-बजाना

पी-पी-पू-पू !

 कोई बच्चा बेतहाशा रो रहा है । चुप कराने की कितनी भीे कोशिश आप कर रहे हैं, वह चुप नहीं होता। बस आप एक पिपुही लेकर उसके नजदीक बजा दीजिए, वह चुप । शायद मुसकरा भी पड़े और उसे लेने के लिए जिद तो करेगा ही । बाजे में यह करामात है ही । लोगों का तो कहना है कि जिस समय मनुष्य जाति अपने बचपन में रही होगी, विद्या-बुद्‌धि का आज जैसा विकास नहीं हुआ होगा; उस समय भी उसमें गाने-बजाने का शौक जरूर हुआ होगा । गाने के जरिये हम अपने दिल के उच्छ्‍वास को प्रकट करते हैं, बाजा उस गाने को भड़कदार और दिलचस्प बना देता है । आज संसार के पिछड़े-से-पिछड़े देश में जाइए, आप वहाँ गाना-बजाना जरूर पाएँगे! पहले कौन-सा बाजा बना होगा, इसका अंदाज लगाने वाले कहते हैं कि पहले कई चीजों काे इकट्‍ठा कर, उन्हें पीट-पीटकर शब्दनिकालने की चेष्टा की गई होगी । मरे हुए पशुओं के चमड़े को पोपले कद्दू पर मढ़कर ढोल और नरकट की गाँठों को छेदकर उससे पिपुही बना ली गई होगी । किसी पोपली चीज में छोटे-छोटे कंकड़ रखकर उसे हिलाने-डुलाने पर एक प्रकार का स्वर निकलते देखकर झुनझुना बनाने की कल्पना की गई होगी । आज भी बहुत से देशों में तीन बाजे हैं- ढोल, पिपुही और झुनझुना; चाहे उनका आकार-प्रकार अलग हो । इन तीनों के सहारे ही नाना तरह के स्वर निकाले जाते हैं ।

 वनवासी लोगों के गाने-बजाने को गौर से सुनने पर मालूम होता है कि उनमें ‘ताल’ पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है, ‘सुर’ पर कम । अमेरिका के रेड इंडियनों को देखिए या अफ्रीका के हब्शी लोगों को, गाने बजाने में ताल की ही प्रमुखता उनके यहाँ है । रेड इंडियनों का टमटम और हब्शी लोगों का ढोल, ताल ही देता है । हब्शी लोग तो ढोल बजाने में इतने उस्ताद हैं कि उन्होंने ढोल की भाषा का ईजाद कर लिया है । एक जगह कोई ढोल बजा रहा है- दूसरा मीलों की दूरी पर बैठा उस ढोल को सुनकर समझ लेता है कि वह क्या कह रहा है ।

 गाने-बजाने का शौक जैसा कि कहा गया है, पिछड़े-से-पिछड़े देश के लोगों में भी है। मध्य अफ्रीका के लोग खूब गाते-बजाते हैं और उनका गवैया दल जहाँ जाता है, उसे पूरा सम्मान मिलता है किंतु वहाँ के

गवैयों पर एक आफत भी है । किंवदंती है कि जो सबसे अच्छा गाता था, राजा उसकी आँखें निकलवा लेता था, जिससे गवैया राज्य छोड़कर दूर देश न चला जाए ।

हर पूर्वी देश का एक-न-एक बाजा मशहूर है । जिस प्रकार भारत में ‘वीणा’ प्रसिद्‍ध है । हमारी सरस्वती देवी भी वीणा ही बजाती हैं । इसे भारत का राष्ट्रीय बाजा समझा जा सकता है । चीन के ऐसे बाजे का नाम ‘राजा’ है । एक काठ का तख्ता लटका रहता है, जिसपर सोलह पत्थर के टुकड़े दो पंक्तियों में सजाए रहते हैं, जिनपर एक काठ की मुँगरी से हलके- हलके मारकर नाना तरह के स्वर निकालते हैं । बर्मा में एक तरह की ‘ढोल तरंग’ बनाई जाती है । भिन्न-भिन्न आकार के इक्कीस ढोलों को अर्ध वृत्ताकार में रखते हैं और बजाने वाला उसके बीच में बैठकर या खड़े होकर उन्हें बजाता है। जापानी लोग बाँस के पोपले टुकड़ों को क्रम से रखकर, उन्हें पीटकर एक प्रकार की दिलचस्प स्वर तरंग निकालते हैं- जिसे ‘ऐंगलौंग’ कहते हैं। जापान में, भारत के ही समान, तार के संयोग से बने बाजों की भी बड़ी कदर है । सितार, सारंगी, वीणा ऐसे बहुत से तारवाले बाजे वहाँ हैं ।

उत्तरी अमेरिका के रेडस्किन जाति के मस्त गवैये होते हैं । उनके पास केवल तीन ही बाजे होते हैं-ढोल, पिपुही और झुनझुना-किंतु इन्हीं के सहारे वे बड़े मजे ले गा लेते हैं । अमेरिका के कुछ आदिनिवासी एक विचित्र ढंग के ढोल का प्रयोग करते हैं । एक छोटे से ढोल में पानी रख देते हैं । अपने स्वर के अनुसार बनाने के लिए गवैये बार-बार उसके पानी को कम या बेशी करते हैं ।

 कुछ बाजे तो खूब ही विचित्र होते हैं । न्यासालैंड टापू के गवैये एक प्रकार का बाजा बजाते हैं, जिसे ‘बाजों की खिचड़ी’ कहा जा सकता है । पैर में अखरोट के छिलके बँधे रहते हैं, जिनके भीतर पत्थर के छोटे-छोटे टुकड़े होते हैं। हाथ में एक तारवाला बाजा रहता है, जिसके सिरे से घंटी लटकती रहती है । जब वे गाते हैं, एक ही साथ झुनझुने, घंटी और तार की आवाज निकलती है। फिजी के आदि अधिवासी एक लंबी-सी बंशी अपनी नाक से बजाते हैं। मलाया में भी ऐसी विचित्र बंशी देखी जाती है । मैक्सिको में जो काठ के ‘मरिंबा’ का प्रयोग किया जाता है, उसपर एक साथ ही चार-चार आदमी तक बजा लेते हैं। हमारे देश का सिंगा भी दूसरे देशवासियों के लिए कुछ कम आश्चर्यजनक बाजा नहीं है ।