३. वाह रे ! हमदर

उस दिन जब मैं पँूजीवादी और समाजवादी अर्थव्यवस्था पर भाषण सुनकर आ रहा था तो सामने से एक कार आ रही थी । भाषण के प्रभाव से मेरी साइकिल को अधिक जोश आया या कार को गुस्सा अधिक आया, यह मैं निश्चित रूप से नहीं कह सकता; किंतु मेरी साइकिल और वह कार जब करीब आए तो विरोधियों की तरह एक-दूसरे को घृणा की नजरों से देखते हुए आपस में जा भिड़े । मैंने खामखाह पँूजीवाद और समाजवाद के झगड़े में टाँग अड़ाई । फलस्वरूप मेरी टाँग टूट गई । दुर्घटना के बाद आज भी इनसानियत कायम है, यह सिद्ध करने के लिए कुछ लोग मेरी तरफ दौड़े। आँख खुली तो मैंने अपने-आपको एक बिस्तर पर पाया । इर्द-गिर्द कुछ परिचित-अपरिचित चेहरे खड़े थे। आँख खुलते ही उनके चेहरों पर उत्सुकता की लहर दौड़ गई । मैंने कराहते हुए पूछा-‘‘मैं कहाँ हँू ?’’

‘‘आप सार्वजनिक अस्पताल के प्राइवेट वार्ड में हैं । आपका ऐक्सिडेंटहो गया था । सिर्फ पैर का फ्रैक्चर हुआ है । अब घबराने की कोई बात नहीं ।’’ एक चेहरा इतनी तेजी से जवाब देता है, लगता है मेरे होश आने तक वह इसीलिए रुका रहा । अब मैं अपनी टाँगों की ओर देखता हूँ । मेरी एक टाँग अपनी जगह पर सही-सलामत थी और दूसरी टाँग रेत की थैली के सहारे एक स्टैंड पर लटक रही थी । मेरे दिमाग में एक नये मुहावरे का जन्म हुआ । ‘टाँग का टूटना’ यानी सार्वजनिक अस्पताल में कुछ दिन रहना ।

सार्वजनिक अस्पताल का खयाल आते ही मैं काँप उठा । अस्पताल वैसे ही एक खतरनाक शब्दहोता है, फिर यदि उसके साथ सार्वजनिक शब्द चिपका हो तो समझो आत्मा से परमात्मा के मिलन होने का समय आ गया। अब मुझे यूँ लगा कि मेरी टाँग टूटना मात्र एक घटना है और सार्वजनिक अस्पताल मंे भरती होना दुर्घटना ।

टाँग से ज्यादा फिक्र मुझे उन लोगों की हुई जो हमदर्दी जताने मुझसे मिलने आएँगे । ये मिलने-जुलने वाले कई बार इतने अधिक आते हैं और कभी-कभी इतना परेशान करते हैं कि मरीज का आराम हराम हो जाता है, जिसकी मरीज को खास जरूरत होती है । जनरल वार्ड का तो एक नियम होता है कि आप मरीज को एक निश्चित समय पर आकर ही तकलीफ दे सकते हैं किंतु प्राइवेट वार्ड, यह तो एक खुला निमंत्रण है कि ‘‘हे मेर परिचितो, रिश्तेदारो, मित्रो ! आओ, जब जी चाहे आओ, चाहे जितनी देर रुको, समय का कोई बंधन नहीं । अपने सारे बदले लेने का यही वक्त है ।’’ बदले का बदला और हमदर्दी की हमदर्दी । मिलने वालों का खयाल आते ही मुझे लगा मेरी दूसरी टाँग भी टूट गई ।

मुझसे मिलने के लिए सबसे पहले वे लोग आए जिनकी टाँग या कुछ और टूटने पर मैं कभी उनसे मिलने गया था, मानो वे इसी दिन का इंतजार कर रहे थे कि कब मेरी टाँग टूटे और कब वे अपना एहसान चुकाएँ । इनकी हमदर्दी में यह बात खास छिपी रहती है कि देख बेटा, वक्त सब पर आता है।

दर्द के मारे एक तो मरीज को वैसे ही नींद नहीं आती, यदि थोड़ी-बहुत आ भी जाए तो मिलने वाले जगा देते हैं- खास कर वे लोग जो सिर्फ औपचारिकता निभाने आते हैं । इन्हें मरीज से हमदर्दी नहीं होती, ये सिर्फ सूरत दिखाने आते हैं। ऐसे में एक दिन मैंने तय किया कि आज कोई भी आए, मैं आँख नहीं खोलँूगा । चुपचाप पड़ा रहँूगा । ऑफिस के बड़े बाबू आए और मुझे सोया जानकर वापस जाने के बजाय वे सोचने लगे कि यदि मैंने उन्हें नहीं देखा तो कैसे पता चलेगा कि वे मिलने आए थे । अतः उन्होंने मुझे धीरे-धीरे हिलाना शुरू किया । फिर भी जब आँखें नहीं खुलीं तो उन्होंने मेरी टाँग के टूटे हिस्से को जाेर से दबाया । मैंने दर्द के मारे कुछ चीखते हुए जब आँख खोली तो वे मुस्कराते हुए बोले- ‘‘कहिए, अब दर्द कैसा है ?’’

मुहल्लेवाले अपनी फुरसत से आते हैं । उस दिन जब सोनाबाई अपने चार बच्चों के साथ आई तो मुझे लगा कि आज फिर कोई दुर्घटना होगी । आते ही उन्होंने मेरी ओर इशारा करते हुए बच्चों से कहा- ‘‘ये देखो चाचा जी !’’ उनका अंदाज कुछ ऐसा था जैसे चिड़ियाघर दिखाते हुए बच्चों से कहा जाता है- ‘‘ये देखो बंदर ।’’

बच्चेखेलने लगे । एक कुर्सी पर चढ़ा तो दूसरा मेज पर । सोनाबाई की छोटी लड़की दवा की शीशी लेकर कथकली डांस करने लगी । रप-रप की आवाज ने मेरा ध्यान बँटाया । क्या देखता हँू कि सोनाबाई का एक लड़का मेरी टाँग के साथ लटक रही रेती की थैली पर बाॅक्सग की प् िं रैक्टिस कर रहा है । मैं इसके पहले कि उसे मना करता, सोनाबाई की लड़की ने दवा की शीशी पटक दी । सोनाबाई ने एक पल लड़की को घूरा, फिर हँसते हुए बोली- ‘‘भैया, पेड़े खिलाओ, दवा गिरना शुभ होता है । दवा गई समझो बीमारी गई ।’’ इसके दो घंटों बाद सोनाबाई गई, यह कहकर कि फिर आऊँगी। मैं भीतर तक काँप गया ।

कुछ लोग तो औपचारिकता निभाने की हद कर देते हैं, विशेष कर वे सार्वजनिक अस्‍पताल में जाकर किसी मरीज से उसके अनुभव सुनिए और अपने शब्‍दों में सुनाइए । अस्‍पताल में लगे सूचना फलक/ विज्ञापनों को पढ़िए तथा कक्षा में चर्चा कीजिए । पठनीय श्रवणीय 12 रिश्तेदार जो दूसरे गाँवों से मिलने आते हैं । ऐसे में एक दिन एक टैक्सी कमरे के सामने आकर रुकी। उसमें से निकलकर एक आदमी आते ही मेरी छाती पर सिर रखकर औंधा पड़ रोने लगा और कहने लगा- ‘‘हाय, तुम्हें क्या हो गया ? कारवालों का सत्यानाश हो !’’ मैंने दिल में कहा कि मुझे जो हुआ सो हुआ, पर तू क्यों रोता है, तुझे क्या हुआ ? वह थोड़ी देर मेरी छाती में मॅुंह गड़ाए रोता रहा । फिर रोना कुछ कम हुआ। उसने मेरी छाती से गरदन हटाई और जब मुझसे आँख मिलाई, तो एकदम चुप हो गया । फिर धीरे-से हँसते हुए बोला- ‘‘माफ करना, मंै गलत कमरे में आ गया था । आजकल लोग ठीक से बताते भी ताे नहीं। गुप्ता जी का कमरा शायद बगल मंे है । हें-हें-हें! अच्छा भाई, माफ करना ।’’ कहकर वह चला गया । अब वही रोने की आवाज मुझे पड़ोस के कमरे से सुनाई पड़ी । मुझे उस आदमी से अधिक गुस्सा अपनी पत्नी पर आया क्योंकि इस प्रकार रोता देख पत्नी ने उसे मेरा रिश्तेदार या करीबी मित्र समझकर टैक्सीवाले को पैसे दे दिए थे ।

हमदर्दी जताने वालों में वे लोग जरूर आएँगे, जिनकी हम सूरत भी नहीं देखना चाहते। हमारे शहर में एक कवि हैं, श्री लपकानंद । उनकी बेतुकी कविताओं से सारा शहर परेशान है । मैं अकसर उन्हें दूर से देखते ही भाग खड़ा होता हँू । जानता हँू जब भी मिलेंगे दस-बीस कविताएँ पिलाए बिना नहीं छोड़ेंगे । एक दिन बगल में झोला दबाए आ पहँुचे । आते ही कहने लगे- ‘‘मैं तो पिछले चार-पाँच दिनों से कवि सम्मेलनों में अति व्यस्त था। सच कहता हँू कसम से, मैं आपके बारे मंे ही सोचता रहा । रात भर मुझे नींद नहीं आई और हाँ, रात को इसी संदर्भ में यह कविता बनाई…।’’ यह कह झोले में से डायरी निकाली और लगे सुनाने-

‘‘असम की राजधानी है शिलाँग

मेरे दोस्त की टूट गई है टाँग

मोटरवाले, तेरी ही साइड थी राँग ।’’

कविता सुनाकर वे मुझे ऐसे देख रहे थे, मानो उनकी एक आँख पूछ रही हो- ‘कहो, कविता कैसी रही ?’ और दूसरी आँख पूछ रही हो-‘बोल, बेटा !

अब भी मुझसे भागेगा ?’ मैंने जल्दी से चाय पिलाई और फिर कविताएँ सुनने का वादा कर बड़ी मुश्किल से विदा किया। अब मैं रोज ईश्वर से प्रार्थना करता हँू कि हे ईश्वर! अगर तुझे मेरी दूसरी टाँग भी तोड़नी हो तो जरूर तोड़ मगर कृपा कर उस जगह तोड़ना जहाँ मेरा कोई भी परिचित न हो, क्योंकि बड़े बेदर्दहोते हैं ये हमदर्दी जताने वाले।