६. सीख

[मोहन बीमारी के कारण रो रहा है । मॉं उसे समझा रही है ।]

मॉं : रोओ मत बेटे, ठीक हो जाओगे । ये लो मंत्रवाला पानी बाबा जी ने दिया है ।

मोहन : इससे क्या होगा मॉं ?

मॉं : इससे तुम्हारी बीमारी छूमंतर हो जाएगी । मैं वैसा ही कर रही हॅूं जैसा कहा गया है । [मोहन के मित्र एवं सहेलियों का आगमन]

सोहम : मोहन ! अब कैसी है तबीयत ?

मोहन : अरे क्या बताऊँ तकलीफ तो बढ़ ही रही है ।

शिल्पा : अस्पताल नहीं गए? दवाई तो लेनी थी ।

मॉं : नहीं, उसकी जरूरत भी नहीं । इसे किसी की नजर लग गई है । बाबा जी ने मंत्रवाला पानी दिया है वह दो-एक दिन में अपने-आप ठीक हो जाएगा ।

सभी मित्र : मोहन, तबीयत की तरफ ध्यान दो । हम निकलते हैं ।

(बच्चे जैसे ही बाहर निकले उसी समय एक बिल्ली ने उनका रास्ता काटा । )

सुषमा : लो, अब तो हम लोगों का काम नहीं होगा ।

महेश : मुझे भी ऐसा ही लगता है । बिल्ली ने रास्ता काटा है ।

सोहन : अरे देखो तो ! सामने से गुरु जी आ रहे हैं । गुरु जी भी मोहन के घर जा रहे होंगे ।

सुषमा : गुरु जी, अभी हम सब आपके घर ही आने वाले थे पर बिल्ली ने रास्ता काट दिया ।

शिल्पा : गुरु जी दूध का दूध और पानी का पानी करेंगे ।

महेश : हमने देखा मोहन की मॉं बीमार मोहन को कोई मंत्र फूँका हुआ पानी पिला रही थी।

गुरु जी : क्यों भला? तुम सब देखते रहे?

सोहम : हम सब क्या करते उनका आदर जो करना था ।

गुरु जी : देखो, बिल्ली का रास्ता काटना, देहली पर छींकना आदि सब अंधविश्वास हैं ।

सुषमा : पर सभी लाेग तो मानते हैं ।

गुरु जी : बीमारी होने के अनेक कारण होते हैं । दवा ही उसका एकमात्र उपाय है । चलो, हम मिलकर मोहन की मॉं को समझाते हैं । जिससे उनकी आँखें खुल जाएगी । सभी मिलकर एक साथ बोलते हैं ‘‘अंधविश्वास से दूर रहो, सत्य की पहचान करो ।’’