७. शिष्टाचार

जब तीन दिन की अनथक खोज के बाद बाबू रामगोपाल एक नौकर ढूँढ़कर लाए तो उनकी क्रुद्ध श्रीमती और भी बिगड़ उठीं । पलंग पर बैठे-बैठे उन्होंने नौकर को सिर से पॉंव तक देखा और देखते ही मँुह फेर दिया ।

 ‘‘यह बनमानस कहॉं से पकड़ लाए हो ? इससे मैं काम लूँगी या इसे लोगों से छिपाती फिरूँगी ?’’ इसका उत्तर बाबू रामगोपाल ने दिया । ‘‘जानती हो, तलब क्या होगी ? केवल बारह रुपए । …. सस्ता नौकर तुम्हें आजकल कहॉं मिलेगा ?’’

 ‘‘तो काम भी वैसा ही करता होगा,’’ श्रीमती बोलीं। ‘‘यह मैं क्या जानँू ? नया आदमी है, अभी अपने गॉंव से आया है ।’’ श्रीमती जी की भौंवें चढ़ गईं, ‘‘तो इसे काम करना भी मैं सिखाऊँगी ? अब मुझपर इतनी दया करो, जो किसी दूसरे नौकर की खोज में रहो । जब मिल जाए तो मैं इसे निकाल दूँगी ।’’

 बाबू रामगोपाल ताे यह सुनकर अपने कमरे मंे चले गए और श्रीमती दहलीज पर खड़े नौकर का कुशल-क्षेम पूछने लगीं । नौकर का नाम हेतू था और शिमला के नजदीक एक गॉंव से आया था । चपटी नाक, छोटा माथा, बेतरह से दॉंत, मोटे हाथ और छोटा-सा कद, श्रीमती ने गलत नहीं कहा था । नाम-पता पूछ चुकने के बाद श्रीमती अपने दाऍं हाथ की उँगली पिस्तौल की तरह हेतू की छाती पर दागकर बोलीं, ‘‘अब दोनों कान खोलकर सुन लो । जो यहॉं चोरी-चकारी की तो सीधा हवालात में भिजवा दूँगी । जो यहॉं काम करना है तो पाई-पाई का हिसाब ठीक देना होगा ।’’

 श्रीमती जी का विचार नौकरों के बारे में वही कुछ था, जो अकसर लोगों का हैकि सब झूठे, गलीज और लंपट होतेहैं। किसी पर विश्वास नहीं किया जा सकता । सभी झूठ बोलतेहैं, सभी पैसेकाटतेहैं और सभी हर वक्त नौकरी की तलाश मेंरहतेहैं, जो मिल जाए तो उसी वक्त घर से बीमारी की चिट्ठी मँगव लेते हैं । श्रीमती जी का व्यवहार नौकरों के साथ नौकरों का-सा ही था । यों भी घर में उनकी हुकूमत थी । जब उन्हें पतिदेव पर गुस्सा आता तो अंग्रेजी में बात करतीं और जब नौकर पर गुस्सा आता तो गालियों में बात करतीं । दोनों की लगाम खींचकर रखतीं । उनकी तेज नजर पलंग पर बैठे-बैठे भी नौकर के हर काम की जानकारी रखती क

नौकर ने कितना घी इस्तेमाल किया, कितनी रोटियॉं निगल गया है । अपनी चाय में कितने चम्मच चीनी उड़ेली है । जासूसी नॉवेलों की शिक्षा के फलस्वरूप उन्हें नौकरों की हर क्रिया में षड्‌यंत्र नजर आता था ।

 काम चलने लगा । हेतू अरूप तो था ही, उसपर उजड्ड और गँवार भी निकला । उसके मोटे-मोटे स्थूल हाथाें से कॉंच के गिलास टूटने लगे, परदाें पर धब्बे पड़ने लगे और घर का काम अस्त-व्यस्त रहने लगा । श्रीमती दिन में दस-दस बार उसे नौकरी से बरखास्त करतीं । पर तब भी हेतू की पीठ मजबूत थी । दिन कटने लगे अौर बाबू रामगोपाल की खोज दूसरे नौकर के लिए शिथिल पड़ने लगी । नौकर उजड्ड और अरूप था, पर दिन में केवल दो बार खाता था । उसपर वेतन केवल बारह रुपए । जो किसी चीज का नुकसान करता तो उसकी तनख्वाह कटती थी । दिन बीतने लगे, हेतू के कपड़े मैले होकर जगह-जगह से फटने लगे, मँुह का रंग और गहरा होने लगा और गॉंव का भोला धीरे-धीरे एक शहरी नौकर में तब्दील होने लगा । इसी तरह तीन महीने बीत गए ।

 पर यहॉं पहुँचकर श्रीमती एक भूल कर गईं । श्रीमान और श्रीमती जी का एक छोटा-सा बालक था, जो अब चार-आठ बरस का हाे चला था आैर प्रथानुसार उसके मुंडन संस्कार के दिन नजदीक आ रहे थे । पूरे घर में बड़े उत्साह और प्यार से मुंडन की तैयारियॉं होने लगीं । बेटे के वात्सल्य ने श्रीमती जी की आँखें आटे, दाल और घी से हटाकर रंग-बिरंगे खिलौनों और कपड़ाें की ओर फेर दीं, शामियाने और बाजे का प्रबंध होने लगा । मित्रों-संबंधियों को निमंत्रण-पत्र लिखे जाने लगे और धीरे-धीरे चाबियांे का गुच्छा श्रीमती जी के दुपट्टे के छोर से निकलकर नौकर के हाथों में रहने लगा ।

 आखिर वह शुभ दिन आ पहँुचा । श्रीमान और श्रीमती के घर के सामने बाजे बजने लगे । मित्र-संबंधी मोटरों व तॉंगों पर बच्चे के लिए उपहार ले-लेकर आने लगे । फूलों, फानूसांे और मित्र मंडली के हास्य[1]विनोद से घर का सारा वातावरण जैसे खिल उठा था । श्रीमान और श्रीमती काम में इतने व्यस्त थे कि उन्हें पसीना पोंछने की भी फुरसत नहीं थी ।

 ऐन उसी वक्त हेतू कहीं बाहर से लौटा और सीधा श्रीमान के सामने आ खड़ा हुआ । ‘‘हुजूर, मुझे छुट्टी चाहिए, मुझे घर जाना है ।’’ श्रीमान उसी वक्त दरवाजे पर खड़े अतिथियों का स्वागत कर रहे थे, हेतू के इस अनोखे वाक्य पर हैरान हो गए । ‘‘क्या बात है ?’’ ‘‘हुजूर, मुझे घर बुलाया है, मुझे आप छुट्टी दे दें ।’’ ‘‘छुट्टी दे दें । आज के दिन तुम्हें छुट्टी दे दूँ ?’’ श्रीमान का क्रोध उबलने लगा, ‘‘जाओ अपना काम देखो । छुट्टी-वुट्टी नहीं मिल सकती। मेहमान खाना खाने वाले हैं और इसे घर जानाहै ।’’ हेतू फिर भी खड़ा रहा, अपनी जगह से नहीं हिला । श्रीमान झुँझला उठे ।

‘‘जाते क्यों नहीं ? छुट्टी नहीं मिलेगी ।’’

 फिर भी जब हेतू टस-से-मस न हुआ तो श्रीमान का क्रोध बेकाबू हो गया और उन्होंने छूटते ही हेतू के मुँह पर एक चॉंटा दे मारा ।

 ‘‘उल्लू के पट्ठे यह वक्त तूने छुट्टी मॉंगने का निकाला है ।’’ चॉंटे की आवाज दूर तक गई । बहुत से मित्र-संबंधियों ने भी सुनी और आँखें उठाकर भी देखा, मगर यह देखकर कि केवल नौकर को चाँटा पड़ा है, अॉंखें फेर लीं ।

 श्रीमती को जब इसकी सूचना मिली तो वह जैसे तंद्रा से जागीं । हो न हो, इसमें कोई भेद है । मैं भी कैसी मूर्ख, जो इस लंपट पर विश्वास करती रही और सब ताले खोलकर इसके सामने रख दिए । इसने न मालूम किस-किस चीज पर हाथ साफ कियाहै, जो आज ही के दिन छुट्टी मॉंगने चला आया है । भागी हुई बाहर आई और बरांडे में खड़ी होकर हेतू को फटकारने लगीं । उन्होंने वह कुछ कहा, जो हेतू के कानों ने पहले कभी नहीं सुना था । कुछ एक संबंधी इकट्ठे हो गए और जलसे में विघ्न पड़ता देखकर श्रीमान को समझाने लगे । एक ने हेतू से पूछा, ‘‘क्यों, घर क्यांे जाना चाहते हो?’’

 ‘‘क्या काम है ?’’

 हेतू ने फिर धीरे से कह दिया ।

 ‘‘जी काम है ।’’

 इसपर श्रीमती का गुस्सा और भड़क उठा, मगर बाकी लोग तो बात को निबटाना चाहते थे, हेतू को चुपचाप धकेलकर परे हटा दिया । फिर पति-पत्नी में परामर्शहुआ । दोनांे इस नतीजे पर पहुँचे कि इस वक्त चुप हो जानाही ठीक है । मुंडन के बाद इसका इलाज सोचेंगे । हेतू बजाय इसके कि फिर काम में जुट जाता, बरांडे के एक कोने में जाकर बैठ गया आैर न हूॅं न हॉं, चुपचाप इधर-उधर ताकने लगा । इस पर श्रीमान आपे से बाहर होने लगे । पहले तो देखते रहे, फिर उसके पास जाकर उससे कड़ककर बोले , ‘‘काम करेगा या मैं किसी को बुलाऊँ ?’’

 हेतू ने फिर वही रट लगाई । ‘‘साहब, मुझे जाने दो, मैं जल्दी लौट अाऊँगा, मुझे काम है ।’’ अािखर जब जलसे में बहुत से लोगों का ध्यान उसी तरफ जाने लगा तो दो-एक मित्रों ने सलाह दी कि उसका नाम-पता लिख लिया जाए, उसकी तनख्वाह रोक ली जाए और उसे जाने दिया जाए । श्रीमान ने अपनी डायरी खोली, उसपर हेतू का पूरा पता लिखा, नीचे अँगूठा लगवाया और धक्के मारकर बाहर निकाल दिया ।

दूसरे दिन श्रीमती ने अपना ट्रंक खोलकर अपनी चीजों की पड़ताल शुरू की । अपने जेवर, सिल्क के जड़ाऊ सूट, चॉंदी के बटन, एक-एक करके जो याद आया, गिन डाला । मगर बड़े घरों में चीजों की सूची कहॉं होती है और एक-एक चीज किसे याद रह सकती है। श्रीमती जल्दी ही थककर बैठ गईं ।

 ‘‘तुमने उसे जाने क्याें दिया ? कभी कोई नौकरों को यों भी जाने देता है? अब मैं क्या जानँू क्या-क्या उठा ले गया है ।’’

 ‘‘जाएगा कहॉं ? उसकी तीन महीने की तनख्वाह मेरे पास है ।’’ ‘‘वाह जी, सौ-पचास की चीज ले गया तो बीस रुपए तनख्वाह की वह चिंता करेगा ?’’

 ‘‘तुम अपनी चीजों को अच्छी तरह देख लो । अगर कोई चीज भी गायब हुई तो मैं पुलिस में इत्तला कर दूँगा । मैंने उसका पता-वता सब लिख लिया है ।’’

 ‘‘तुम समझ बैठे हो कि उसने तुम्हें पता ठीक लिखवाया होगा ?’’ दूसरा नौकर आ गया और घर का काम पहले की तरह चलने लगा । जब श्रीमती जी को काेई चीज न मिलती तो वह हेतू को गालियॉं देतीं, पर श्रीमान धीरे-धीरे दिल ही दिल में अफसोस करने लगे । कई बार उनके जी में आया कि उसके पैसे मनीआॅर्डर द्‌वारा भेज दंे, मगर फिर कुछ श्रीमती के डर से, कुछ अपने संदेह के कारण रुक जाते ।

 एक दिन शाम का वक्त था । थके हुए श्रीमान दफ्तर से घर लौट रहे थे, जब उनकी नजर सड़क के पार एक धर्मशाला के सामने खड़े हुए हेतू पर पड़ गई । वही फटे हुए कपड़े वही शिथिल अरूप चेहरा । उन्हें पहचानने में देर नहीं लगी । झट से सड़क पार करके हेतू के सामने जा खड़े हुए और उसे कलाई से पकड़ लिया ।

‘‘अरे तू कहॉं था इतने दिन? गॉंव से कब लौटा?’’

 ‘‘अभी-अभी लौटा हॅूं साहब ।’’ हेतू ने जवाब दिया।

 ‘‘काम कर आया है अपना ।’’

 हेतू ने धीरे से कहा –

‘‘जी ।’’

 ‘‘कौन-सा ऐसा जरूरी काम था, जो जलसेवाले दिन भाग गया?’’ हेतू चुप रहा ।

‘‘बोलते क्यों नहीं, क्या काम था? मैं कुछ नहीं कहूँगा, सच-सच बता दो ।’’

 सहसा हेतू की आँखों में आँसू आ गए । होंठ बात करने के लिए खुलते, मगर फिर बंद हो जाते । बार-बार आँसू छिपाने का यत्न करता, मगर आँखें ऐसी छलक आई थीं कि आँसुओं को रोकना असंभव हो गया था । बाबू रामगोपाल पसीज उठे ।

‘‘अच्छा, क्या बात है ?’’ उसका कंधा सहलाते हुए बोले । ‘‘जी मेरा बच्चा मर गया था ।’’ लड़खड़ाती हुई आवाज में हेतू ने कहा । बाबू रामगोपाल को सुनकर दुख हुआ । थोड़ी देर तक चुपचाप खड़े उसके मुँह की ओर देखते हैं, फिर बोले, ‘‘मगर तुमने उस वक्‍त कहा क्‍यों नहीं ? तुमसे बार-बार पूछा गया, मगर तुम कुछ भी न बोले ?’’

 ‘‘क्‍यों ?’’ हेतू ने धीरे से कहा, ‘जी वहाँ कैसे कहता ।’ ‘‘खुशीवाले घर में यह नहीं कहते । हमारे गावँ में इसे बुरा मानते हैं ।’’ और श्रीमान स्‍तब्‍ध और हैरान उस उजड्ड गँवार के मुँह की ओर देखने लगे ।