७. हींगवाला

लगभग पैंतीस साल का एक खान आंॅगन में आकर रुक गया । हमेशा की तरह उसकी आवाज सुनाई दी – ‘‘अम्मा… हींग लोगी?’’ पीठ पर बँधे हुए पीपे को खोलकर उसने नीचे रख दिया और मौलसिरी के नीचे बने हुए चबूतरे पर बैठ गया । भीतर बरामदे से नौ-दस वर्ष के एक बालक ने बाहर निकलकर उत्तर दिया – ‘‘अभी कुछ नहीं लेना है, जाओ !’’

पर खान भला क्यों जाने लगा ? जरा आराम से बैठ गया और अपने साफे के छोर से हवा करता हुआ बोला- ‘‘अम्मा, हींग ले लो, अम्मा ! हम अपने देश जाता है, बहुत दिनों में लौटेगा ।’’ सावित्री रसोईघर से हाथ धोकर बाहर आई और बोली – ‘‘हींग तो बहुत-सी ले रखी है खान ! अभी पंद्रह दिन हुए नहीं, तुमसे ही तो ली थी ।’’

 वह उसी स्वर में फिर बोला- ‘‘हेरा हींग है माँ, हमको तुम्हारे हाथ की बोहनी लगती है । एक ही तोला ले लो, पर लो जरूर ।’’ इतना कहकर फौरन एक डिब्बा सावित्री के सामने सरकाते हुए कहा- ‘‘तुम और कुछ मत देखो माँ, यह हींग एक नंबर है, हम तुम्हें धोखा नहीं देगा।’’

 सावित्री बोली- ‘‘पर हींग लेकर करूँगी क्या ? ढेर-सी तो रखी है ।’’ खान ने कहा-‘‘कुछ भी ले लो अम्मा ! हम देने के लिए आया है, घर में पड़ी रहेगी । हम अपने देश कू जाता है । खुदा जाने, कब लौटेगा ?’’ और खान बिना उत्तर की प्रतीक्षा किए हींग तौलने लगा। इसपर सावित्री के बच्चे नाराज हुए । सभी बोल उठे-‘‘मत लेना माँ, तुम कभी न लेना । जबरदस्ती तौले जा रहा है ।’’ सावित्री ने किसी की बात का उत्तर न देकर, हींग की पुड़िया ले ली । पूछा-‘‘कितने पैसे हुए खान ?’’

 ‘‘इक्‍कीस रुपये अम्मा!’’ खान ने उत्तर दिया । सावित्री ने तीन रुपये तोले के भाव से सात तोले का दाम, इक्‍कीस रुपये लाकर खान को दे दिए। खान सलाम करके चला गया पर बच्चों को माँ की यह बात अच्छी न लगी ।

 बड़े लड़के ने कहा-‘‘हींग की कुछ जरूरत नहीं थी ।’’ छोटा माँ से चिढ़कर बोला-‘‘दो माँ, दो रुपये हमको भी दो । हम बिना लिए न रहेंगे ।’’ लड़की जिसकी उम्र आठ साल की थी, बड़े गंभीर स्वर में

बोली-‘‘तुम माँ से पैसा न माँगो । वह तुम्हें न देंगी । उनका बेटा तो वही खान है ।’’ सावित्री को बच्चों की बातों पर हँसी आ रही थी । उसने अपनी हँसी दबाकर बनावटी क्रोध से कहा- ‘‘चलो-चलो, बड़ी बातें बनाने लग गए हो । खाना तैयार है, खाओ ।’’

 कई महीने बीत गए । सावित्री की सब हींग खत्म हो गई । इस बीच होली आई । होली के अवसर पर शहर में खासी मारपीट हो गई थी। सावित्री कभी- कभी सोचती, हींगवाला खान तो नहीं मार डाला गया? न जाने क्यों, उस हींगवाले खान की याद उसे प्राय: आ जाया करती थी । एक दिन सवेरे-सवेरे सावित्री उसी मौलसिरी के पेड़ के नीचे चबूतरे पर बैठी कुछ बुन रही थी । उसने सुना, उसके पति किसी से कड़े स्वर में कह रहे हैं- ‘’क्या काम है ? भीतर मत जाओ । यहाँ आओ ।’’ उत्तर मिला- ‘‘हींग है, हेरा हींग’’ और खान तब तक आँगन में सावित्री के सामने पहुँच चुका था । खान को देखते ही सावित्री ने कहा- ‘‘बहुत दिनों में आए खान ! हींग तो कब की खत्म हो गई ।’’

 खान बोला- ‘‘अपने देश गया था अम्मा, परसों ही तो लौटा हूँ ।’’ सावित्री ने कहा- ‘‘यहाँ तो बहुत जोरों का दंगा हो गया है ।’’ खान बोला-‘‘सुना, समझ नहीं है लड़ने वालों में ।’’

सावित्री बोली-‘‘खान, हमारे घर चले आए तुम्हें डर नहीं लगा ?’’ दोनों कानों पर हाथ रखते हुए खान बोला-‘‘ऐसी बात मत करो अम्मा । बेटे को भी क्या माँ से डर हुआ है, जो मुझे होता ?’’ और इसके बाद ही उसने अपना डिब्बा खोला और एक छटाँक हींग तौलकर सावित्री को दे दी । रेजगारी दोनों में से किसी के पास नहीं थी । खान ने कहा कि वह पैसा फिर आकर ले जाएगा । सावित्री को सलाम करके वह चला गया ।

 इस बार लोग दशहरा दूने उत्साह के साथ मनाने की तैयारी में थे । चार बजे शाम को माँ काली का जुलूस निकलने वाला था । पुलिस का काफी प्रबंध था । सावित्री के बच्चों ने कहा- ‘‘हम भी काली माँ का जुलूस देखने जाएँगे ।’’ सावित्री के पति शहर से बाहर गए थे । उसने बच्चों को न जान कितने प्रलोभन दिए पर बच्चे न माने, सो न माने । नौकर रामू भी जुलूस देखने को बहुत उत्सुक हो रहा था । उसने कहा- ‘‘भेज दो न माँ जी, मैं अभी दिखाकर लिए आता हूँ ।’’ लाचार होकर सावित्री को जुलूस देखने के लिए बच्चों को बाहर भेजना पड़ा । उसने बार-बार रामू को ताकीद की कि दिन रहते ही वह बच्चों को लेकर लौट आए ।

बच्चों को भेजने के साथ ही सावित्री लौटने की प्रतीक्षा करने लगी। देखते-ही-देखते दिन ढल चला । अँधेरा भी बढ़ने लगा पर बच्चे न लौटे । अब सावित्री को न भीतर चैन था, न बाहर । सावित्री की स्‍थिति मानो ऐसी हो गई थी जैसे-अब पछताए होत क्‍या जब चिड़ियाँ चुग गईं खेत । इतने में उसे कुछ आदमी सड़क पर भागते हुए जान पड़े । वह दौड़कर बाहर आई, पूछा-‘‘ऐसे भागे क्यों जा रहे हो ? जुलूस तो निकल गया न ।’’

एक आदमी बोला-‘‘दंगा हो गया जी, बड़ा भारी दंगा !’’ सावित्री के हाथ-पैर ठंडे पड़ गए । तभी कुछ लोग तेजी से आते हुए दिखे । सावित्री ने उन्हें भी रोका । उन्होंने भी कहा-‘‘दंगा हो गया है !’’ अब सावित्री क्या करे ? उन्हीं में से एक से कहा-‘‘भाई, तुम मेरे बच्चों की खबर ला दो । दो लड़के हैं, एक लड़की । मैं तुम्हें मुँहमाँगा इनाम दूँगी ।’’ एक देहाती ने जवाब दिया-‘‘क्या हम तुम्हारे बच्चों को पहचानते हैं माँ जी ?’’ यह कहकर वह चला गया ।

 सावित्री सोचने लगी, सच तो है, इतनी भीड़ में भला कोई मेरे बच्चों को खोजे भी कैसे? पर अब वह भी करे, तो क्या करे? उसे रह[1]रहकर अपने पर क्रोध आ रहा था । आखिर उसने बच्चों को भेजा ही क्यों ? वे तो बच्चेठहरे, जिद तो करते ही पर भेजना उसके हाथ की बात थी । सावित्री पागल-सी हो गई । मानाे उसके प्राण मुरझा गए। बच्चों की मंगल कामना के लिए उसने सभी देवी-देवता मना डाले । शोरगुल बढ़कर शांत हो गया । रात के साथ-साथ नीरवता बढ़ चली पर उसके बच्चे लौटकर न आए । सावित्री हताश हो गई और फूट-फूटकर रोने लगी । उसी समय उसे वही चिरपरिचित स्वर सुनाई पड़ा- ‘‘अम्मा !’’

सावित्री दौड़कर बाहर आई उसने देखा, उसके तीनों बच्चे खान के साथ सकुशल लौट आए हैं । खान ने सावित्री को देखते ही कहा, ‘‘वक्त अच्छा नहीं है अम्मा ! बच्चों को ऐसी भीड़-भाड़ में बाहर न भेजा करो ।’’ बच्चे दौड़कर माँ से लिपट गए और उन्होंने एक साथ कहा, ‘‘खान बहुत अच्छा है माँ ! उसने हमें बचाया ।’’