८. माँ

प्रकृति का प्रारूप हो तुम
माँ! जगत का रूप हो तुम ||

समता की गागर हो तुम
ममता का सागर हो तुम
सरल, सहज, सुरूप हो तुम
माँ! जगत का रूप हो तुम ।।

संस्कारों की ज्योति जलाती।
जीवन का आधार सजाती
ऐसी अजब, अनूप हो तुम ।
माँ! जगत का रूप हो तुम ॥

माँ! ब्रह्मांड स्वरूप हो तुम
माँ! जगत का रूप हो तुम ॥

रमेश यादव