९. रीढ़ की हड्डी

पात्र
उमा– सुशिक्षित युवती, रामस्वरूप-उमा के पिता, प्रेमा-उमा की माँ, शंकर-युवक, गोपाल प्रसाद-शंकर के पिता रतन-रामस्वरूप का नौकर

[एक कमरा । अंदर के दरवाजे से आते हुए जिन महाशय की पीठ नजर आ रही है, वह अधेड़ उम्र के हैं। एक तख्त को पकड़े हुए कमरे में आते हैं । तख्त का दूसरा सिरा उनके नौकर ने पकड़ रखा है ।]

रामस्वरूप : अबे ! धीरे-धीरे चल ।…. अब तख्त को उधर मोड़ दे… उधर । (तख्त के रखे जाने की आवाज आती है ।)

रतन :  बिछा दें साहब?

रामस्वरूप : (जरा तेज आवाज में) और क्या करेगा? परमात्मा के यहाँ अक्ल बँट रही थी तो तू देर से पहँुचा था क्या ?… बिछा दूँ साहब ! … और यह पसीना किसलिए बहाया है ?

रतन : (तख्त बिछाता है) हीं-हीं-हीं ।

रामस्वरूप : (दरी उठाते हुए) और बीबी जी के कमरे में से हारमोनियम उठा ला और सितार भी ।… जल्दी जा (रतन जाता है । पति-पत्नी तख्त पर दरी बिछाते हैं ।)

प्रेमा : लेकिन वह तुम्हारी लाड़ली बेटी उमा तो मुँह फुलाए पड़ी है। रामस्वरूप ः क्या हुआ ? प्रेमा ः तुम्हीं ने तो कहा था कि उसे ठीक-ठाक करके नीचे लाना।

रामस्वरूप : अरे हाँ, देखो, उमा से कह देना कि जरा करीने से आए । ये लोग जरा ऐसे ही हैं। खुद पढ़े-लिखे हैं, वकील हैं, सभा-सोसायटियों में जाते हैं; मगर चाहते हैं कि लड़की ज्यादा पढ़ी-लिखी न हो ।

प्रेमा : और लड़का ?

रामस्वरूप : बाप सेर है तो लड़का सवा सेर । बी.एस्सी. के बाद लखनऊ में ही तोपढ़ता है मेडिकल काॅलेज में । कहता है कि शादी का सवाल दूसरा है, पढ़ाई का दूसरा । क्या करूँ, मजबूरी है ।

रतन : बाबू जी, बाबू जी ! (धीमी आवाज में)

रामस्वरूप : (दरवाजे से बाहर झाँककर) अरे प्रेमा, वे आ भी गए । … तुम उमा को समझा देना, थोड़ा-सा गा देगी । (मेहमानों से) हँ-हँ-हँ । आइए, आइए ! [बाबू गोपाल प्रसाद बैठते हैं।] हँ-हँ !… मकान ढँूढ़ने में कुछ तकलीफ तो नहीं हुई ? गो.

प्रसाद : (खँखारकर) नहीं । ताँगेवाला जानता था । रास्ता मिलता कैसे नहीं?

रामस्वरूप : हँ-हँ-हँ ! (लड़के की तरफ मुखातिब होकर) और कहिए शंकर बाबू, कितने दिनों की छुट्‌टियाँ हैं?

शंकर : जी, काॅलेज की तो छुट्‌टियाँ नहीं हैं । ‘वीक एंड’ में चला आया था ।

रामस्वरूप : तो आपके कोर्सखत्म होने में ताे अब साल भररहा होगा?

शंकर : जी, यही कोई साल-दो साल ।

रामस्वरूप : साल, दो साल?

शंकर : हँ-हँ-हँ !… जी एकाध साल का ‘मार्जिन’ रखता हँू ।

गो. प्रसाद : (अपनी आवाज और तरीका बदलते हुए) अच्छा तो साहब, फिर ‘बिजनेस’ की बातचीत हो जाए।

रामस्वरूप : (चौंककर) ‘बिजनेस’?- (समझकर) ओह !… अच्छा, अच्छा । लेकिन जरा नाश्ता तो कर लीजिए ।

गो. प्रसाद : यह सब आप क्या तकल्लुफ करते हैं !

रामस्वरूप : हँ-हँ-हँ ! तकल्लुफ किस बात का। यह तो मेरी बड़ी तकदीर है कि आप मेरे यहाँ तशरीफ लाए । (अंदर जाते हैं ।)

गो. प्रसाद : (अपने लड़के से) क्यों, क्या हुआ ?

शंकर : कुछ नहीं ।

गो. प्रसाद : झुककर क्यों बैठते हो ? ब्याह तय करने आए हो, कमर सीधी करके बैठो । तुम्हारे दोस्त ठीक कहते हैं कि शंकर की ‘बैकबोन’-[इतने में बाबू रामस्वरूप चाय की ‘ट्रे’ लाकर मेज पर रख देते हैं।]

 गो. प्रसाद : आखिर आप माने नहीं !

रामस्वरूप : (चाय प्याले में डालते हुए)हँ-हँ-हँ ! आपको विलायती चाय पसंद है या हिंदुस्तानी ?

 गो. प्रसाद : नहीं-नहीं साहब, मुझे आधा दूध और आधी चाय दीजिए और जरा चीनी भी ज्यादा डालिएगा ।

शंकर : (खँखारकर) सुना है, सरकार अब ज्यादा चीनी लेने वालों पर ‘टैक्स’ लगाएगी ।

गो. प्रसाद : (चाय पीते हुए) सरकार जो चाहे सो कर ले पर अगर आमदनी करनी है तो सरकार को बस एक ही टैक्स लगाना चाहिए ।

रामस्वरूप : (शंकर को प्याला पकड़ाते हुए) वह क्या ?

गो. प्रसाद : खूबसूरती पर टैक्स ! (रामस्वरूप और शंकर हंॅस पड़ते हैं।) मजाक नहीं साहब, यह ऐसा टैक्स है जनाब कि देने वाले चँू भी न करेंगे ।

रामस्वरूप : (जोर से हँसते हुए) वाह-वाह ! खूब सोचा आपने ! वाकई आजकल खूबसूरती का सवाल भी बेढब हो गया है । हम लोगों के जमाने में तो यह कभी उठता भी न था। (तश्तरी गोपाल की तरफ बढ़ाते हैं ।) लीजिए ।

गो. प्रसाद : (समोसा उठाते हुए) कभी नहीं साहब, कभी नहीं ।

रामस्वरूप : (शंकर की तरफ मुखातिब होकर) आपका क्या खयाल है शंकर बाबू ?

शंकर : किस मामले में?

रामस्वरूप : यही कि शादी तय करने में खूबसूरती का हिस्सा कितना होना चाहिए !

 गो. प्रसाद : (बीच में ही) यह बात दूसरी है बाबू रामस्वरूप, मैंने आपसे पहले भी कहा था, लड़की का खूबसूरत होना निहायत जरूरी है और जायचा (जन्म पत्र) तो मिल ही गया होगा ।

 रामस्वरूप : जी, जायचे का मिलना क्या मुश्किल बात है । ठाकुर जी के चरणों में रख दिया । बस, खुद-ब-खुद मिला हुआ समझिए। [शंकर भी हँसता है, मगर गोपाल प्रसाद गंभीर हो जाते हैं ।]

 गो. प्रसाद : लड़कियों को अधिक पढ़ने की जरूरत नहीं है । सिलाई-पुराई कर लें बस ।

रामस्वरूप :  हँ-हँ ! (मेज को एक तरफ सरका देते हैं। फिर अंदर के दरवाजे की तरफ मुँह कर जरा जोर से) अरे, जरा पान भिजवा देना… [उमा पान की तश्तरी अपने पिता को देती है । उस समय उसका चेहरा ऊपर को उठ जाता है और नाक पर रखा हुआ सुनहरी रिमवाला चश्मा दीखता है। बाप-बेटे चौंक उठते हैं।]

गो. प्रसाद और शंकर : (एक साथ) चश्मा !!!

 रामस्वरूप : (जरा सकपकाकर) जी, वह तो… वह… पिछले महीने में इसकी आँखें दुखने लग गई थीं, सो कुछ दिनों के लिए चश्मा लगाना पड़ रहा है ।

 गो. प्रसाद : पढ़ाई-वढ़ाई की वजह से तो नहीं है कुछ ?

रामस्वरूप : नहीं साहब, वह तो मैंने अर्जकिया न ।

 गो. प्रसाद : हँू । (संतुष्ट होकर कुछ कोमल स्वर में) बैठो बेटी ।

 रामस्वरूप : वहाँ बैठ जाओ उमा, उस तख्त पर, अपने बाजे-वाजे के पास । (उमा बैठती है ।)

गो. प्रसाद : चाल में तो कुछ खराबी है नहीं । चेहरे पर भी छवि है।… हाँ, कुछ गाना-बजाना सीखा है ?

रामस्वरूप : जी हाँ सितार भी और बाजा भी । सुनाओ तो उमा एकाध गीत सितार के साथ । [उमा सितार पर मीरा का मशहूर भजन ‘मेरे तो गिरिधर गोपाल’ गाना शुरू कर देती है । उसकी आँखें शंकर की झेंपती-सी आँखों से मिल जाती हैं और वह गाते-गाते एक साथ रुक जाती है ।]

रामस्वरूप : क्यों, क्या हुआ ? गाने को पूरा करो उमा ।

गो. प्रसाद : नहीं-नहीं साहब, काफी है। आपकी लड़की अच्छा गाती है। (उमा सितार रखकर अंदर जाने को बढ़ती है ।)

गो. प्रसाद : अभी ठहरो, बेटी !

रामस्वरूप : थोड़ा और बैठी रहो उमा ! (उमा बैठती है ।)

गो. प्रसाद : (उमा से) तो तुमने पेंटिग-वेटिंग भी सीखी है ?(उमा चुप)

रामस्वरूप : हाँ, वह तो मैं आपको बताना भूल ही गया । यह जो तस्वीर टँगी हुई है, कुत्तेवाली, इसी ने बनाई हैऔर वह उस दीवार पर भी ।

गो. प्रसाद : हँू । यह तो बहुत अच्छा है । और सिलाई वगैरह?

रामस्वरूप : सिलाई तो सारे घर की इसी के जिम्मे रहती है, यहाँ तक कि मेरी कमीजें भी । हँ-हँ-हँ !

 गो. प्रसाद : ठीक ।… लेकिन, हाँ बेटी, तुमने कुछ इनाम-बिनाम भी जीते थे? [उमा चुप । रामस्वरूप इशारे के लिए खाँसते हैं लेकिन उमा चुप है, उसी तरह गरदन झुकाए । गोपाल प्रसाद अधीर हो उठते हैं और रामस्वरूप सकपकाते हैं ।]

रामस्वरूप : जवाब दो, उमा । (गोपाल से) हँ-हँ, जरा शरमाती है।

 इनाम तो इसने-

गो. प्रसाद : (जरा रूखी आवाज में) जरा इसे भी तो मुँह खोलना चाहिए।

रामस्वरूप : उमा, देखो, आप क्या कह रहे हैं । जवाब दो न ।

उमा : (हल्की लेकिन मजबूत आवाज में) क्या जवाब दूँ बाबू जी! जब कुर्सी-मेज बिकती है तब दुकानदार कुर्सी-मेज से कुछ नहीं पूछता सिर्फ खरीददार को दिखला देता है । पसंद आ गई तो अच्छा है, वरना-

रामस्वरूप : (चौंककर खड़े हो जाते हैं ।) उमा, उमा !

उमा : अब मुझे कह लेने दीजिए बाबू जी ।

गो. प्रसाद : (ताव में आकर) बाबू रामस्वरूप, आपने मेरी इज्जत उतारने के लिए मुझे यहाँ बुलाया था?

उमा : (तेज आवाज में) जी हाँ, और हमारी बेइज्जती नहीं होती जो आप इतनी देर से नाप-तौल कर रहे हैं ?

 शंकर : बाबू जी, चलिए ।

गो. प्रसाद : क्या तुम काॅलेज में पढ़ी हो? (रामस्वरूप चुप)

उमा : जी हाँ, मैं काॅलेज में पढ़ी हँू । मैंने बी.ए. पास किया है । कोई पाप नहीं किया, कोई चोरी नहीं की और न आपके पुत्र की तरह लड़कियों के होस्टल में ताक-झाँककर कायरता दिखाई है । मुझे अपनी इज्जत, अपने मान का खयाल तो है लेकिन इनसे पूछिए कि ये किस तरह नौकरानी के पैरों में पड़कर अपना मुँह छिपाकर भागे थे ।

रामस्वरूप : उमा, उमा !

गो. प्रसाद : (खड़े होकर गुस्से में) बस हो चुका । बाबू रामस्वरूप आपने मेरे साथ दगा किया । आपकी लड़की बी.ए. पास है और आपने मुझसे कहा था कि सिर्फ मैट्रिक तक पढ़ी है । (दरवाजे की ओर बढ़ते हैं ।)

उमा : जी हाँ, जाइए, जरूर चले जाइए ! लेकिन घर जाकर जरा यह पता लगाइएगा कि आपके लाड़ले बेटे के रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं- याने बैकबोन, बैकबोन-[बाबू गोपाल प्रसाद के चेहरे पर बेबसी का गुस्सा है और उनके लड़के के रुलासापन । दोनों बाहर चले जाते हैं । उमा सहसा चुप हो जाती है ।]

(‘भोर का तारा’ एकांकी संग्रह से)