4. किताबें

किताबें झॉंकती हैं बंद अलमारी के शीशों से,

 बड़ी हसरत से तकती हैं ।

 महीनों अब मुलाकातें नहीं होतीं,

 जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं

 अब अक्‍सर ……..

गुजर जाती हैं ‘कंप्यूटर के पर्दों पर’

 बड़ी बेचैन रहती हैं किताबें ……..

उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है

 जो कदरंे वो सुनाती थी

 कि जिनके ‘सेल’ कभी मरते नहीं थे,

 वो कदरें अब नजर आती नहीं घर में,

 जो रिश्तेवो सुनाती थीं ।

 वह सारे उधड़े-उधड़े हैं,

 कोई सफा पलटता तो इक सिसकी निकलती है,

 कई लफ्जाें के मानी गिर पड़े हैं

 बिना पत्‍तों के सूखे-टुंड लगते हैं वो सब अल्‍फाज,

 जिन पर अब कोई मानी नहीं उगते ……..

जुबांपर जो जायका आता था जो सफा पलटनेका

 अब उँगली ‘क्‍लिक’ करनेसेबस

 झपकी गुजरती है

 बहुत कुछ तह-ब-तह खुलता चला जाता हैपरदेपर,

 किताबों सेजो जाती राब्‍ता था, कट गया है……..

कभी सीनेपेरख केलेट जातेथे

 कभी गोदी मेंलेतेथे

 कभी घुटनों को अपनेरिहल की सूरत बनाकर

नीम-सजदेमेंपढ़ा करतेथे, छूतेथेजबीं से

वो सारा इल्‍म तो मिलता रहेगा आइंदा भी

 मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल

 और महकेहुए रुक्‍के

 किताबें गिरने, उठानेकेबहानेरिश्ते बनते थे

 उनका क्‍या होगा ? वो शायद अब नहीं होंगे!!

– गुलजार