8. गजल

आपसे किसने कहा स्‍वर्णिम शिखर बनकर दिखो,
शौक दिखने का है तो फिर नींव के अंदर दिखाे ।

चल पड़ी तो गर्द बनकर आस्‍मानों पर लिखो,
और अगर बैठो कहीं ताे मील का पत्‍थर दिखाे ।

सिर्फ देखने के लिए दिखना कोई दिखना नहीं,
आदमी हो तुम अगर तो आदमी बनकर दिखाे ।

जिंदगी की शक्‍ल जिसमें टूटकर बिखरे नहीं,
पत्‍थरों के शहर में वो आईना बनकर दिखो ।

आपको महसूस होगी तब हरइक दिल की जलन,
जब किसी धागे-सा जलकर मोम के भीतर दिखाे ।

एक जुगनू ने कहा मैं भी तुम्‍हारे साथ हूँ,
वक्‍त की इस धुंध में तुम रोशनी बनकर दिखो ।

एक मर्यादा बनी है हम सभी के वास्‍ते,
गर तुम्‍हें बनना है मोती सीप के अंदर दिखो ।

डर जाए फूल बनने से कोई नाजुक कली,
तुम ना खिलते फूल पर तितली के टूटे पर दिखो ।

कोई ऐसी शक्‍ल्‍ा तो मुझको दिखे इस भीड़ में,
मैं जिसे देखूँ उसी में तुम मुझे अक्‍सर दिखो ।

(‘गजल मेरी इबादत है’ से)